Aarti Ki Puja Vidhi / आरती की पूजा विधि

Aarti Ki Puja Vidhi Aur Mahattva
आरती की पूजा विधि और महत्त्व


Aarti Ki Puja Vidhi Aur Mahattva, आरती की पूजा विधि और महत्त्व :- आरती किसी भी देवी-देवता के भजन, कीर्तन और पूजा के अंत में किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कर्म है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इसे पूजा-पाठ आदि का अहम अंग बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है यह देवता के गुणों की प्रशंसा गीत है।

आरती की पूजा विधि :-

आरती में पहले मूलमन्त्र (जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र) के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये और ढोल, नगाड़े, शंख, घड़ियाल आदि महावाद्यों तथा जय-जयकार के शब्द के साथ शुभ पात्र में घृत या कपूर से विषम संख्या की बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये। साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे ‘पंचप्रदीप’ भी कहते हैं। कपूर से भी आरती होती है। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानों वह पंच-प्राणों की सहायता में ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अन्तर्मन से से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह ‘पंचारती’ कहलाती है। पद्य पुराण में आया है – ‘कुंकुम, अगर, कपूर घृत और चन्दन की पाँच या सात बत्तियाँ बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियाँ बनाकर शंख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिए।

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महत्त्वपूर्ण तथ्य :- प्रत्येक जनमानस के लिए आरती शब्द अत्यन्त प्राचीन है। किसी भी देवता के पूजन से संबंधित स्थलों पर आरती का अवश्य दर्शन होता है फिर ‘ओम जय जगदीश हरे’ किसे नहीं ज्ञात होगा। जिस देवता की आरती करनी होती, उस देवता का बीज मन्त्र, स्नान थाली, नीराजन थाली, घण्टिका और जल कमण्डलु आदि पात्रों पर चन्दन आदि से लिखना चाहिए और फिर आरती द्वारा भी बीज मन्त्र को देव प्रतिमा के सामने बनाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति तत्तद देवताओं के बीज मन्त्रों का ज्ञान न रखता हो तो सभी देवताओं के लिए ‘ओम’ और ‘स्वास्तिक’ को लिखना चाहिए ,अर्थात् आरती को इस प्रकार घुमाना चाहिए, जिससे ‘ओम के वर्ण की आकृति बन जाय। जिस देवता का सम्बन्ध जितनी संख्या से हो उतनी बार आरती दिखानी चाहिए।

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