Aatm Uddhar Ke Liye Prerna / आत्म उद्धार के लिए प्रेरणा

अध्याय छह ध्यानयोग

Aatm Uddhar Ke Liye Prerna Aur Bhagwatprapt Purush Ke Lakshan
आत्म उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण

Aatm Uddhar Ke Liye Prerna Aur Bhagwatprapt Purush Ke Lakshan, आत्म उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण। जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे पुरुष के लिए सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं। योगी को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर, मन तथा आत्मा को परमेश्वर में लगाए, एकान्त स्थान में रहे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करें। 

श्लोक 5 से 10

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।। 5 ।।

उद्धरेत् — उद्धार करे; आत्मना — मन से; आत्मानम् — बद्धजीव को; अवसादयेत् — पतन होने दे; आत्मा — मन; एव — निश्चय ही; हि — निस्सन्देह; आत्मनः — बद्धजीव का; बन्धुः — मित्र; आत्मा — मन; एव — निश्चय ही; रिपुः — शत्रु; आत्मनः — बद्धजीव का। 

तात्पर्य — मनुष्य को चाहिए कि अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने नीचे न गिरने दे। यह मन बद्धजीव का मित्र भी है और शत्रु भी।

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मानस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ।। 6 ।।

बन्धुः — मित्र; आत्मा — मन; आत्मनः — जीव का; तस्य — उसका; येन — जिससे; आत्मा — मन; एव — निश्चय ही; आत्मना — जीवात्मा के द्वारा; जितः — विजित; अनात्मनः — जो मन को वश में नहीं कर पाया उसका; तु — लेकिन; शत्रुत्वे — शत्रुता के कारण; वर्तेत — बना रहता है; आत्मा एव — वही मन; शत्रु-वत् — शत्रु की भाँति।

तात्पर्य — जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय चार — दिव्य ज्ञान
  2. अधयाय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  3. अध्याय छह — ध्यानयोग
  4. 1 से 4 — कर्मयोग का विषय और योगरूढ़ पुरुष के लक्षण

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ।। 7 ।।

जित-आत्मनः — जिसने मन को जीत लिया है; प्रशान्तस्य — मन को वश में करके शान्ति प्राप्त करने वाले को; परम-आत्मा — परमात्मा; समाहितः — पूर्णरूप से प्राप्त; शीत — सर्दी; उष्ण — गर्मी में; सुख — सुख; दुःखेषु — तथा दुःख में; तथा — भी; मान — सम्मान; अपमानयोः — तथा अपमान में।

तात्पर्य — जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे पुरुष के लिए सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समळोष्ट्राश्मकाञ्चनः ।। 8 ।।

ज्ञान — अर्जित ज्ञान; विज्ञान — अनुभूत ज्ञान से; तृप्त — संतुष्ट; आत्मा — जीव; कूट-स्थः — आध्यात्मिक रूप से स्थित; विजित-इन्द्रियः — इन्द्रियों को वश में करके; युक्तः — आत्म-साक्षात्कार के लिए सक्षम; इति — इस प्रकार; उच्यते — कहा जाता है; योगी — योग का साधक; सम — समदर्शी; लोष्ट्र — कंकड़; अश्म — पत्थर; काञ्चनः — स्वर्ण। 

तात्पर्य — वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है, जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है। ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है। वह सभी वस्तुओं को — चाहे वे कंकड़ हो, पत्थर हों या कि सोना — एकसमान देखता है।

 सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।। 9 ।।

सु-हृत् — स्वभाव से; मित्र — स्नेहपूर्ण हितेच्छु; अरि — शत्रु; उदासीन — शत्रुओं में तटस्थ; मध्य-स्थ — शत्रुओं में पंच; द्वेष्य — ईर्ष्यालु; बन्धुषु — सम्बन्धियों या शुभेच्छुकों में; साधुषु — साधुओं में; अपि — भी; च — तथा; पापेषु — पापियों में; सम-बुद्धिः — समान बुद्धि वाला; विशिष्यते — आगे बढ़ा हुआ होता है।

तात्पर्य — जब मनुष्य निष्कपट हितैषियों, प्रिय मित्रों, तटस्थों, मध्यस्थों, ईर्ष्यालुओं, शत्रुओं तथा मित्रों, पुण्यात्माओं एवं पापियों को समान भाव से देखता है, तो वह और भी उन्नत माना जाता है।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।। 10 ।।

योगी — योगी; युञ्जीत — कृष्णचेतना में केन्द्रित करे; सततम् — निरन्तर; आत्मानम् — स्वयं को ( मन, शरीर तथा आत्मा से ); रहसि — एकान्त स्थान में; स्थितः — स्थित होकर; एकाकी — अकेले; यत-चित्त-आत्मा — मन में सदैव सचेत; निराशीः — किसी अन्य वस्तु से आकृष्ट हुए बिना; अपरिग्रहः — स्वामित्व की भावना से रहित, संग्रहभाव से मुक्त। 

तात्पर्य — योगी को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर, मन तथा आत्मा को परमेश्वर में लगाए, एकान्त स्थान में रहे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करे। उसे समस्त आकांक्षाओं तथा संग्रहभाव की इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए।

आगे के श्लोक :–

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