Achala Ekadashi Vrat Katha / अचला एकादशी व्रत कथा

Achala Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi
अचला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि


Achala Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi, अचला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि :- अचला एकादशी ज्येष्ठ मास के में मनाया जाता है। यह अचला तथा ‘ अपरा ‘ दो नामों से जाना जाता है। इस व्रत के करने से ब्रह्महत्या, परनिन्दा, भूत-योनि-जैसे निष्कृष्ट कर्मों से छुटकारा मिल जाता है। इसके करने से कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार अचला एकादशी व्रत रखने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और व्रतियों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को करने से भगवान् विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। इस व्रत के करने मात्र से कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती है।

अचला एकादशी पूजा विधि :-

ऐसी मान्यता है कि जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अचला एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। विद्वानों के अनुसार अचला एकादशी के व्रत के करने से ब्रह्महत्या, परनिन्दा, भूत-योनि-जैसे निष्कृष्ट कर्मों से छुटकारा मिल जाता है। इसके करने से कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती है।

अचला एकादशी व्रत कथा :-

महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था, जिसका छोटा भाई बज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस अवसरवादी पापिष्ठ ने एक दिन रात्रि में बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को जंगली पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। मृत्यु के उपरान्त वह राजा प्रेतात्मा रूप में पीपल के वृक्ष से अनेक उत्पात करने लगा।

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