Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan / अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण

अध्याय तीन कर्मयोग

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan Tatha Rag Dwesh
अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण तथा राग द्वेष

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan Tatha Rag Dwesh Se Rahit Hokar Karma Karne Ke Liye Prerna, अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण तथा राग द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा- विद्वान व्यक्ति चाहिए कि वह सकाम कर्मों में आसक्त अज्ञानी पुरुषों को कर्म करने से रोके नहीं ताकि उनके मन विचलित न हों । अपितु भक्तिभाव से कर्म करते हुए वह उन्हें सभी प्रकार के कार्यों में लगाये ( जिससे कृष्णभावनामृत का क्रमिक विकास हो )।

श्लोक 25 से 35

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ।। 25 ।।

सक्ताः — आसक्त; कर्मणि — नियत कर्मों में; अविद्वांसः — अज्ञानी; यथा — जिस तरह; कुर्वन्ति — करते हैं; भारत — हे भरतवंशी; कुर्यात् — करना चाहिए; विद्वान् — विद्वान; तथा — उसी तरह; असक्तः — अनासक्त; चिकीर्षुः — चाहते हुए भी, इच्छुक; लोक-सङ्ग्रहम् — सामान्य जन। 

तात्पर्य — जिस प्रकार अज्ञानी-जन फल की आसक्ति से कार्य करते हैं, उसी तरह विद्वान् जनों को चाहिए कि वे लोगों को उचित पथ पर ले जाने के लिए अनासक्त रहकर कार्य करें।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ।। 26 ।।

न — नहीं; बुद्धि-भेदम् — बुद्धि का विचलन; जनयेत् — उत्पन्न करें; अज्ञानाम् — मूर्खों का; कर्म-सङ्गिनाम् — सकाम कर्मों में आसक्त; जोषयेत् — नियोजित करे; सर्व — सारे; कर्माणि — कर्म; विद्वान् — वैद्वान व्यक्ति; युक्तः — लगा हुआ, तत्पर; समाचरन् — अभ्यास करता हुआ ।

तात्पर्य — विद्वान व्यक्ति चाहिए कि वह सकाम कर्मों में आसक्त अज्ञानी पुरुषों को कर्म करने से रोके नहीं ताकि उनके मन विचलित न हों । अपितु भक्तिभाव से कर्म करते हुए वह उन्हें सभी प्रकार के कार्यों में लगाये ( जिससे कृष्णभावनामृत का क्रमिक विकास हो )।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।। 27 ।।

प्रकृतेः — प्रकृति का; क्रियमाणानि — किये जाकर; गुणैः — गुणों के द्वारा; कर्माणि — कर्म; सर्वशः — सभी प्रकार के; अहङ्कार-विमूढ — अहंकार से मोहित; आत्मा — आत्मा; कर्ता — करने वाला; अहम् — मैं हूँ; इति — इस प्रकार; मन्यते — सोचता है। 

तात्पर्य — जीवात्मा अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जब कि वास्तव में वे प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ।। 28 ।।

तत्त्व-वित् — परम सत्य को जानने वाला; तु — लेकिन; महा-बाहो — हे विशाल भुजाओं वाले; गुण-कर्म — भौतिक प्रभाव के अंतर्गत कर्म के; विभागयोः — भेद के; गुणाः — इन्द्रियाँ; गुणेषु — इन्द्रियतृप्ति में; वर्तन्ते — तत्पर रहती है; इति — इस प्रकार; मत्वा — मानकर; न — कभी नहीं; सज्जते — आसक्त होता है। 

तात्पर्य — हे महाबाहो ! भक्तिभावमय कर्म तथा सकाम कर्म के भेद को भलीभाँति जानते हुए जो परम सत्य को जानने वाला है, वह कभी भी अपने आपको इन्द्रियों में तथा इन्द्रियतृप्ति में नहीं लगता।

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ।। 29 ।।

प्रकृतेः — प्रकृति के; गुण — गुणों से; सम्मूढ़ाः — भौतिक पहचान से बेवकूफ बने हुए; सज्जन्ते — लग जाते हैं; गुण-कर्मसु — भौतिक कर्मों में; तान् — उन; अकृत्स्न-विदः — अल्पज्ञानी पुरुष; मन्दान् — आत्म-साक्षात्कार समझने में आलसियों को; कृत्सन्न-वित् — ज्ञानी; न — नहीं; विचालयेत् — विचलित करने का प्रयत्न करना चहिए।

तात्पर्य — माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें आसक्त हो जाते हैं। यद्यपि उनके ये कार्य उनमें ज्ञानाभाव के कारण अधम होते हैं, किन्तु ज्ञानी को चाहिए कि उन्हें विचलित न करे।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय दो — गीता का सार
  2. अध्याय तीन — कर्मयोग
  3. 17 से 24 — ज्ञानवान और भगवान् के लिए लोकसंग्रहार्थ
  4. 36 से 43 — काम के निरोध का विषय

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ।। 30 ।।

मयि — मुझमें; सर्वाणि — सब तरह के; कर्माणि — कर्मों को; सन्न्यस्य — पूर्णतया त्याग करके; अध्यात्म — पूर्ण आत्मज्ञान से युक्त; चेतसा — चेतना से; निराशीः — लाभ की आशा से रहित, निष्काम; निर्ममः — स्वामित्व की भावना से रहित, ममतात्यागी; भूत्वा — होकर; युध्यस्व — लड़ो; विगत-ज्वरः — आलस्य-रहित। 

तात्पर्य — अतः हे अर्जुन ! अपने सारे कार्यों को मुझमें समर्पित करके मेरे पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर, लाभ की आकांक्षा से रहित, स्वामित्व के किसी दावे के बिना तथा आलस्य से रहित होकर युद्ध करो।

ये में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ।। 31 ।।

ये — जो; मे — मेरे; मतम् — आदेशों को; इदम् — इन; नित्यम् — नित्यकार्य के रूप में; अनुतिष्ठन्ति — नियमित रूप से पालन करते हैं; मानवाः — मानव प्राणी; श्रद्धा-वन्तः — श्रद्धा तथा भक्ति समेत; अनसूयन्तः — बिना ईर्ष्या के; मुच्यन्ते — मुक्त हो जाते हैं; ते — वे; अपि — भी; कर्मभिः — सकामकर्मों के नियमरूपी बन्धन से। 

तात्पर्य — जो व्यक्ति मेरे आदेशों के अनुसार अपना कर्तव्य करते रहते हैं और ईर्ष्यारहित होकर इस उपदेश का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

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