Akshaya Tritiya Vrat Katha / अक्षय तृतीया व्रत कथा

Akshaya Tritiya Vrat Katha Aur Puja Vidhi
अक्षय तृतीया व्रत कथा और पूजा विधि


Akshaya Tritiya Vrat Katha Aur Puja Vidhi, अक्षय तृतीया व्रत कथा और पूजा विधि :- वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया के नाम से पुकारा गया है। इस दिन किये गये होम, जप, तप, स्नान आदि अक्षय रहते हैं, ऐसी मान्यता है। यह तिथि परशुराम का जन्मदिन होने के कारण ‘ परशुराम ‘ तीज भी कही जाती है। त्रेतायुग का आरम्भ भी इसी तिथि से हुआ है। इस दिन गंगा स्नान का बड़ा भारी माहात्म्य है। इस दिन स्वर्गीय आत्माओं की प्रसन्नता के लिए कलश, पंखा, खड़ाऊँ, छाता, सूत, ककड़ी, खरबूजा आदि फल, शक्कर आदि पदार्थ ब्राह्मण को दान करना चाहिए। उसी दिन चारों धामों में उल्लेखनीय श्री बदरीनाथ धाम के पट खुलते हैं। इस दिन भक्त जनों को श्री बदरी नारायण का चित्र सिंहासन पर रख के मिश्री तथा चने की भीगी दाल का भोग लगाना चाहिये।

 अक्षय तृतीया पूजा विधि महत्त्व :-

अक्षय तृतीया के दिन प्रातःकाल स्नान आदि करने के उपरांत भगवान् की पूजा करने समय व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के पूजा स्थल या फिर किसी भी पवित्र स्थान पर विष्णु जी और मां लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। व्रत रखने के इच्छुक हो तो उसका संकल्प लें। भगवान् विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा को पंचामृस से स्नान करवाएं। सुगन्धित पुष्प से बनी हुई माला पहनाएं। फिर गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित करें। संभव हो तो इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम पाठ और श्री सूक्त का पाठ भी कर लें। अंत में तुलसी का जल चढ़ाकर आरती उतारें और ब्राह्मणों को दान करें। अक्षय तृतीया के दिन सोना अथवा चांदी के आभूषण खरीदने का विधान है। कई लोग घर में बरकत के लिए इस दिन सोने या चांदी की लक्ष्मी की चरण पादुका लाकर घर में रखते और उसकी नियमित पूजा करते हैं। इस दिन फल-फूल, बर्तन, वस्त्र, गौ, भूमि, जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खड़ाऊं, चावल, नमक, घी, खरबूजा, चीनी साग, आदि दान करना पुण्यकारी माना जाता है।

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