Anand Lahari Stotram / आनन्द लहरी स्तोत्रम्

Anand Lahari Stotram
आनन्द लहरी स्तोत्रम्

Anand Lahari Stotram, आनन्द लहरी स्तोत्रम् :- समस्त रोगों को नष्ट करने वाली एक चलती-फिरती चिदानन्दमयी लता (उमा) सुशोभित हो रही है, वह हिमालय से उत्पन्न हुई है, सुन्दर हाथ ही उसके पल्लव हैं, मुक्ता का हार ही सुन्दर फूल है, काली-काली अलकें भ्रमरों की भाँति उसे आच्छन्न किये हुई हैं, स्थाणु (शंकरजी अथवा ठूँठ वृक्ष) ही उसके रहने का आश्रय है, उरोज रूपी फलों के भार से वह झुकी हुई है और सुन्दर वाणी रूपी रस से भरी है।

भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः 
प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि ।

न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति
स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे भवानि ! प्रजापति ब्रह्माजी अपने चार मुखों से भी तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं, त्रिपुरविनाशक महादेवजी पाँच मुखों से भी तुम्हारा स्तवन नहीं कर सकते, कार्तिकेयजी तो छः मुखों के रहते हुए भी असमर्थ हैं, इने-गिने मुखवालों की बात ही क्या है, नागराज शेष हजार मुखों से भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्हीं बताओ, जब इनकी यह दशा है तो दूसरे किसी को और किस प्रकार तुम्हारी स्तुति का अवसर प्राप्त हो सकता है ?

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घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै-
र्विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः ।

तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः 
कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे ।। 2 ।।

अर्थात् :- घी, दूध, दाख और मधु की मधुरता को किसी भी शब्द से विशेष रूप से नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवल रसना (जिह्वा) ही जानती है। इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवल महादेवजी के नेत्रों का विषय है, उसे हम क्यों कर बतावें ? हे देवि ! तुम्हारे गुणों का वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते। 

मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला
ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता ।

स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी 
भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- तुम्हारे मुख में पान है, नेत्रों में काजल की पतली रेखा है, ललाट में केसर की बंदी है, गले में मोती का हार सुशोभित हो रहा है, कटिके निम्नभाग में सुनहली साड़ी है, जिस पर रत्नमयी मेखला (करधनी) चमक रही है, ऐसी वेश-भूषा से सजी हुई गिरिराज हिमालय की गौरवर्णा कन्या तुमको मैं सदा ही भजता हूँ। 

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विराजन्मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी 
नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा ।

नताङ्गी मातङ्गीरुचिरगतिभङ्गी भगवती 
सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ।। 4 ।। 

अर्थात् :- जहाँ पारिजात-पुष्प की माला सुशोभित हो रही है, उन उरोजों के समीप बजती हुई वीणा का मधुर नाद श्रवण करते हुए जिनके कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जिनका अंग झुका हुआ है, हथिनी की भाँति जिनकी मन्द-मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमल के समान सुन्दर और चंचल हैं, वे शम्भु की सती भार्या भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी हो रही हैं। 

नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूषापरिकरै-
र्वताङ्गी सारङ्गी रुचिर नयनाङ्गीकृतशिवा ।

तडित्पिता पीताम्बरललितमञ्जीरसुभगा 
ममापर्ण पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ।। 5 ।। 

अर्थात् :- जिनका अंग नवोदित बाल रवि के समान देदीप्यमान मणि और सोने के आभूषणों से अलंकृत है, मृगी के समान जिनके विशाल एवं सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिव को पति रूप से स्वीकार किया है, बिजली के समान जिनकी पीत प्रभा है, जो पीत वस्त्र की प्रभा पड़ने से और अधिक सुन्दर प्रतीत होने वाले मंजीर को चरणों में धारण करके सुशोभित हो रही हैं, वे निरतिशय आनन्द से पूर्ण भगवती अपर्णा मुझ पर सुप्रसन्न हों। 

हिमाद्रैः संभूता सुललितकरैः पल्लवयुता 
सुपुष्पा मुक्ताभिर्भ्रमरकलिता चालकभरैः ।

कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्तिसरसा 
रूजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका ।। 6 ।।

अर्थात् :- समस्त रोगों को नष्ट करने वाली एक चलती-फिरती चिदानन्दमयी लता (उमा) सुशोभित हो रही है, वह हिमालय से उत्पन्न हुई है, सुन्दर हाथ ही उसके पल्लव हैं, मुक्ता का हार ही सुन्दर फूल है, काली-काली अलकें भ्रमरों की भाँति उसे आच्छन्न किये हुई हैं, स्थाणु (शंकरजी अथवा ठूँठ वृक्ष) ही उसके रहने का आश्रय है, उरोज रूपी फलों के भार से वह झुकी हुई है और सुन्दर वाणी रूपी रस से भरी है।

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