Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay / अन्य देवताओं की उपासना

अध्याय सात भगवद्ज्ञान

Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay
अन्य देवताओं की उपासना का विषय

Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay, अन्य देवताओं की उपासना का विषय- मैं प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा स्वरुप स्थित हूँ। जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ, जिससे वह उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके। ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त है। 

श्लोक 20 से 23

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।। 20 ।।

कामैः — इच्छाओं द्वारा; तैः तैः — उन उन; हृत — विहीन; ज्ञानाः — ज्ञान से; प्रपद्यन्ते — शरण लेते हैं; अन्य — अन्य; देवताः — देवताओं की; तम् तम् — उस उस; नियमम् — विधान का; आस्थाय — पालन करते हुए; प्रकृत्या — स्वभाव से; नियताः — वश में हुए; स्वया — अपने आप। 

तात्पर्य — जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं द्वारा मारी गई है, वे देवताओं की शरण में जाते हैं और वे अपने-अपने स्वभाव के अनुसार पूजा के विशेष विधि-विधानों का पालन करते हैं।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ।। 21 ।। 

यः यः — जो जो; याम् याम् — जिस जिस; तनुम् — देवता के रूप को; भक्तः — भक्त; श्रद्धया — श्रद्धा से; अर्चितुम् — पूजा करने के लिए; इच्छति — इच्छा करता है; तस्य तस्य — उस उसकी; अचलाम् — स्थिर; श्रद्धाम् — श्रद्धा को; ताम् — उस; एव — निश्चय ही; विदधामि — देता हूँ; अहम् — मैं।

तात्पर्य — मैं प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा स्वरुप स्थित हूँ। जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ, जिससे वह उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके।

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  1. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  2. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  3. 8 से 12 — भगवान् की व्यापकता का कथन
  4. 13 से 19 — आसुरी स्वभाव वालों की निन्दा और भगवद्भक्तों की व्याख्या

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ।। 22 ।।

सः — वह; तया — उस; श्रद्धया — श्रद्धा से; युक्तः — युक्त; तस्य — उस देवता की; आराधनम् — पूजा के लिए; ईहते — आकांक्षा करता है; लभते — प्राप्त करते हैं; च — तथा; ततः — उससे; कामान् — इच्छाओं को; मया — मेरे द्वारा; एव — ही; विहितान् — व्यवस्थिता; हि — निश्चय ही; तान् — उन।

तात्पर्य — ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त है।

 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।। 23 ।।

अन्त-वत् — नाशवान; तु — लेकिन; फलम् — फल; तेषाम् — उनका; तत् — वह; भवति — होता है; अल्प-मेधसाम् — अल्पज्ञों का; देवान् — देवताओं के पास; देव-यजः — देवताओं को पूजने वाले; यान्ति — जाते हैं; भक्ताः — भक्तगण; यान्ति — जाते हैं; माम् — मेरे पास; अपि — भी।

तात्पर्य — अल्पबुद्धि वाले व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें प्राप्त होने वाले फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं। देवताओं की पूजा करने वाले देवलोक को जाते हैं, किन्तु मेरे भक्त अन्ततः मेरे परमधाम को प्राप्त होते हैं।

आगे के श्लोक :–

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