Arjun Dwara Bhagwan Ke Vishwaroop / अर्जुन द्वारा भगवान्

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Arjun Dwara Bhagwan Ke Vishwaroop Ko Dekhne Ki Stuti Karna
अर्जुन द्वारा भगवान् के विश्वरूप को देखने की स्तुति करना

Arjun Dwara Bhagwan Ke Vishwaroop Ko Dekhne Ki Stuti Karna, अर्जुन द्वारा भगवान् के विश्वरूप को देखने की स्तुति करना- अर्जुन ने कहा — हे भगवान् कृष्ण ! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ। मैं कमल पर आसीन ब्रह्मा, शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ। हे देवेश ! कृपा करके मुझे बतलाइये कि इतने उग्ररूप में आप कौन हैं ? 

श्लोक 15 से 31

अर्जुन  उवाच —
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसड्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मुशींश्च सर्वानुरागांश्च दिव्यान् ।। 15 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन कहा; पश्यामि — देखता हूँ ; देवान् — समस्त देवताओं को; तव — आपके; देव — हे प्रभु; देहे — शरीर में ; सर्वान् — समस्त; तथा — भी; भूत — जीव; विशेष-सड्घान् — विशेष रूप से एकत्रित; ब्रह्माणम् — ब्रह्मा को; ईशम् — शिव को; कमल-आसन-स्थम् — कमल के ऊपर आसीन; ऋषीन् — ऋषियों को; च — भी; सर्वान् — समस्त; उरगान् — सर्पों को; च — भी; दिव्यान् — दिव्य। 

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे भगवान् कृष्ण ! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ। मैं कमल पर आसीन ब्रह्मा, शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ।। 16 ।।

अनेक — कई; बाहु — भुजाएँ; उदर — पेट; वक्त्र — मुख; नेत्रम् — आँखें ; पश्यामि — देख रहा हूँ ; त्वाम् — आपको; सर्वतः — चारों ओर; अनन्त-रुपम् — असंख्य रूप; न अन्तम् — अन्तहीन, कोई अन्त नहीं है; न मध्यम् — मध्य रहित; न पुनः — न फिर; तव — आपका; आदिम् — प्रारम्भ; पश्यामि — देखता हूँ ; विश्व-ईश्वर — हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्व-रूप — ब्रह्माण्ड के रूप में।

तात्पर्य — हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप ! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका कोई अन्त नहीं है। आपमें न अन्त दिखता है, न मध्य और न आदि।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।। 17 ।।

किरीटिनम् — मुकुट युक्त; गदिनम् — गदा धारण किये; चक्रिणम् — चक्र समेत; च — तथा; तेजः-राशिम् — तेज; सर्वतः — चारों ओर; दीप्ति-मन्तम् — प्रकाश युक्त; पश्यामि — देखता हूँ ; त्वाम् — आपको; दुर्निरीक्ष्यम् — देखने में कठिन; समन्तात् — सर्वत्र; दीप्त-अनल — प्रज्ज्वलित अग्नि ; अर्क — सूर्य की; द्युतिम् — धूप; अप्रमेयम् — अनन्त।

तात्पर्य — आपके रूप को उसके चकाचौंध तेज के कारण देख पाना कठिन है, क्योंकि वह प्रज्ज्वलित अग्नि की भाँति अथवा सूर्य के अपार प्रकाश की भाँति चारों ओर फैल रहा है। तो भी मैं इस तेजोमय रूप को सर्वत्र देख रहा हूँ, जो अनेक मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ।। 18 ।।

त्वम् — आप; अक्षरम् — अच्युत; परमम् — परम; वेदितव्यम् — जानने योग्य; त्वम् — आप; अस्य — इस; विश्वस्य — विश्व के; परम् — परम; निधानम् — आधार; त्वम् — आप; अव्ययः — अविनाशी; शाश्वत-धर्म-गोप्ता — शाश्वत धर्म के पालक; सनातनः — शाश्वत; त्वम् — आप; पुरुषः — परमपुरुष; मतः मे — मेरा मत है।

तात्पर्य — आप परम आद्य ज्ञेय वस्तु हैं। आप इस ब्रह्माण्ड के परम आधार ( आश्रय ) हैं। आप अव्यय तथा पुराण पुरुष हैं। आप सनातन धर्म के पालक भगवान् हैं। यही मेरा मत है।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ।। 19 ।।

अनादि — आदिरहित; मध्य — मध्य; अन्तम् — या अन्त; अनन्त — असीम; वीर्यम् — महिमा; अनन्त — असंख्य; बाहुम् — भुजाएँ; शशि — चन्द्रमा; सूर्य — तथा सूर्य; नेत्रम् — आँखें ; पश्यामि — देखता हूँ ; त्वाम् — आपको; दीप्त — प्रज्ज्वलित; हुताश-वक्त्रम् — आपके मुख से निकलती अग्नि को; स्व-तेजसा — अपने तेज से; विश्वम् — विश्व को; इदम् — इस; तपन्तम् — तपाते हुए।

तात्पर्य —   आप यदि, मध्य तथा अन्त से रहित हैं। आपका यश अनन्त है। आपकी असंख्य भुजाएँ हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा आपकी आँखें हैं। मैं आपके मुख से प्रज्ज्वलित अग्नि निकलते और आपके तेज से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जलते हुए देख रहा हूँ।

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  1. अध्याय दो — गीता का सार
  2. अध्याय ग्यारह — विराट रूप

 द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रुपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ।। 20 ।।

द्यौ — बाह्य आकाश से लेकर; आ-पृथिव्योः — पृथ्वी तक; इदम् — इस; अन्तरम् — मध्य में ; हि — निश्चय ही; व्याप्तम् — व्याप्त; त्वया — आपके द्वारा; एकेन — अकेला; दिशः — दिशाएँ; च — तथा; सर्वाः — सभी; दृष्ट्वा — देखकर; अद्भुतम् — अद्भुत; रूपम् — रूप को; उग्रम् — भयानक; तव — आपके; इदम् — इस; लोक — लोक; त्रयम् — तीन; प्रव्यथितम् — भयभीत, विचलित; महा-आत्मन् — हे महापुरुष। 

तात्पर्य — यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं। हे महापुरुष ! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखकर सारे लोक भयभीत हैं। 

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीयुक्तवा महर्षिसिद्धसङ्घा
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ।। 21 ।।

अमौ — वे सब; हि — निश्चय ही; त्वाम् — आपको; सुर-सङ्घाः — देव समूह; विशन्ति — प्रवेश कर रहे हैं ; केचित् — उनमें से कुछ; भीताः — भयवश; प्राञ्जलयः — हाथ जोड़े; गृणन्ति — स्तुति कर रहे हैं ; स्वस्ति — कल्याण हो; इति — इस प्रकार; उक्त्वा — कहकर; महा-ऋषि — महर्षिगण; सिद्ध-सङ्घाः — सिद्ध लोग; स्तुवन्ति — स्तुति कर रहे हैं ; त्वाम् — आपकी; स्तुतिभिः — प्रार्थनाओं से; पुष्कलाभिः — वैदिक स्तोत्रों से। 

तात्पर्य — देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है। उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहे हैं। महर्षियों तथा सिद्धों के समूह ” कल्याण हो ” कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकी स्तुति कर रहे हैं।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ।। 22 ।।

रुद्र — शिव का रूप; आदित्याः — आदित्यगण; वसवः — सारे वसु; ये — जो; च — तथा; साध्याः — साध्य; विश्वे — विश्वेदेवता; अश्विनौ — अश्विनीकुमार; मरुतः — मरुद्गण; च — तथा; उष्म-पाः — पितर; च — तथा; गन्धर्व — गन्धर्व; यक्ष — यक्ष; असुर — असुर; सिद्ध — तथा सिद्ध देवताओं के; सङ्घा — समूह; वीक्षन्ते — देख रहे हैं ; त्वाम् — आपको; विस्मिताः — आश्चर्यचकित होकर; च — भी; एव — निश्चय ही; सर्वे — सब। 

तात्पर्य — शिव के विविध रूप, आदित्यगण, वसु, साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धदेव सभी आपको आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं।

 रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरूपादम् ।
बहुदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ।। 23 ।।

रूपम् — रूप; महत् — विशाल; ते — आपका; बहु — अनेक; वक्त्र — मुख; नेत्रम् — तथा आँखें ; महा-बाहो — हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; बहु — अनेक; बाहु — भुजाएँ ; ऊरु — जाँघें ; पादम् — तथा पाँव; बहु-उदरम् — अनेक पेट; बहु-दंष्ट्रा — अनेक दाँत; करालम् — भयानक; दृष्ट्वा — देखकर; लोकाः — सारे लोक; प्रव्यथिताः — विचलित; तथा — उसी प्रकार; अहम् — मैं। 

तात्पर्य — हे महाबाहु ! आपके इस अनेक मुख, नेत्र, बाहु, जंघा, पाँव, पेट तथा भयानक दाँतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यन्त विचलित हैं और उन्हीं की तरह मैं भी हूँ।

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