Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti / अर्जुन द्वारा भगवान्

अध्याय दस श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti Tatha Vibhuti Aur Yog Shakti
अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति तथा विभूति और योग शक्ति

Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti Tatha Vibhuti Aur Yog Shakti, अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति तथा विभूति और योग शक्ति- अर्जुन ने कहा- आप परम भगवान्, परम धाम, परम पवित्र, परम सत्य हैं। आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं। हे जनार्दन !

श्लोक 12 से 18

अर्जुन उवाच — 
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभूम् ।। 12 ।।

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ।। 13 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; परम् — परम; ब्रह्म — सत्य; परम् — परम; धाम — आधार; पवित्रम् — शुद्ध ; परमम् — परम; भवान् — आप; पुरुषम् — पुरुष; शाश्वतम् — नित्य; दिव्यम् — दिव्य; आदि-देवम् — आदि स्वामी; अजम् — अजन्मा; विभुम् — सर्वोच्च; आहुः — कहते हैं ; त्वाम् — आपको; ऋषयः — साधुगण; सर्वे — सभी; देव-ऋषिः — देवताओं के ऋषि; नारदः — नारद; तथा — भी; असितः — असित; देवलः — देवल; व्यासः — व्यास; स्वयम् — स्वयं; च — भी; एव — निश्चय ही; ब्रवीषि — आप बता रहे हैं ; मे — मुझको।

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — आप परम भगवान्, परम धाम, परम पवित्र, परम सत्य हैं। आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं।

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ।। 14 ।।

सर्वम् — सब; एतत् — इस; ऋतम् — सत्य को; मन्ये — स्वीकार करता हूँ ; यत् — जो; माम् — मुझको; वदसि — कहते हो; केशव — हे कृष्ण; न — कभी नहीं ; हि — निश्चय ही; ते — आपको; भगवन् — हे भगवान्; व्यक्तिम् — स्वरुप को; विदुः — जान सकते हैं ; देवाः — देवतागण; न — न तो; दानवाः — असुरगण। 

तात्पर्य — हे कृष्ण ! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ। हे प्रभु ! न तो देवतागण, न ही असुरगण ही आपके स्वरुप को समझ सकते हैं।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  2. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
  3. 1 से 7 — भगवान् की विभूति और योगशक्ति
  4. 12 से 18 — अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति

 स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ।। 15 ।।

स्वयम् — स्वयं; एव — निश्चय ही; आत्मना — अपने आप; आत्मानम् — अपने को; वेत्थ — जानते हो; त्वम् — आप; पुरुष-उत्तम — हे पुरुषोत्तम; भूत-भावन — हे सबको उद्गम; भूत-ईश — सभी जीवों के स्वामी; देव-देव — हे समस्त देवताओं के स्वामी; जगत्-पते — हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी। 

तात्पर्य — हे परमपुरुष, हे सबके उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे ब्रह्माण्ड के प्रभु ! निस्सन्देह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अन्तरंगाशक्ति से जानने वाले हैं।

 वक्तुमर्हस्याशेषण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ।। 16 ।।

वक्तुम् — कहने के लिए; अर्हसि — योग्य हैं ; अशेषण — विस्तार में ; दिव्याः — दैवी, अलौकिक; हि — निश्चय ही; आत्म — अपना; विभूतयः — ऐश्वर्य; याभिः — जिन; विभूतिभिः — ऐश्वर्यों से; लोकान् — समस्त लोकों से; इमान् — इन; त्वम् — आप; व्याप्य — व्याप्त होकर; तिष्ठसि — स्थित हैं। 

तात्पर्य — कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्वर्यों को बतायें, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं।

 कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ।। 17 ।।

कथम् — किस तरह, कैसे; विद्याम् अहम् — मैं जान सकूँ ; योगिन् — हे परम योगी; त्वाम् — आपको; सदा — सदैव; परिचिन्तयन् — चिन्तन करता हुआ; केषु — किस; केषु — किस; च — भी; भावेषु — रूपों में ; चिन्त्यःअसि — आपका स्मरण किया जाता है; भगवन् — हे भगवान् ; मया — मेरे द्वारा।

तात्पर्य — हे कृष्ण, हे परम योगी ! मैं किस तरह आपका निरन्तर चिन्तन करूँ और आपको कैसे जानूँ ? हे भगवान् ! आपका स्मरण किन-किन रूपों में किया जाय?

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ।। 18 ।।

विस्तरेण — विस्तार से; आत्मनः — अपनी; योगम् — योगशक्ति; विभूतिम् — ऐश्वर्यों को; च — भी; जन-अर्दन — हे नास्तिकों का वध करने वाले; भूयः — फिर; कथय — कहें ; तृप्ति — तुष्टि; हि — निश्चय ही; शृण्वतः — सुनते हुए; न अस्ति — नहीं है; मे — मेरी; अमृतम् — अमृत को। 

तात्पर्य — हे जनार्दन ! आप पुनः विस्तार से अपने ऐश्वर्य तथा योगशक्ति का वर्णन करें। मैं आपके विषय में सुनकर कभी तृप्त नहीं होता हूँ, क्योंकि जितना ही आपके विषय में सुनता हूँ, उतना ही आपके शब्द-अमृत को चखना चाहता हूँ।

आगे के श्लोक :–

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