Arjun Dwara Sena Nirikshan / अर्जुन द्वारा सेना निरीक्षण

अध्याय एक कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल

Arjun Dwara Sena Nirikshan Ka Prasang
अर्जुन द्वारा सेना निरीक्षण का प्रसंग

Arjun Dwara Sena Nirikshan Ka Prasang, अर्जुन द्वारा सेना निरिक्षण का प्रसंगउस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठा कर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ। हे राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में खड़ा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे। अर्जुन ने कहा – हे अच्युत ! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें जिससे मैं यहाँ उपस्थित युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों की इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ।

श्लोक 20 से 27 


अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।। 20 ।।

अथ — तत्पश्चात्; व्यवस्थितान् — स्थित; दृष्ट्वा — देखकर; धार्तराष्ट्रान् — धृतराष्ट्र के पुत्रों को; कपि-ध्वजः — जिसकी पताका पर हनुमान अंकित हैं ; प्रवृत्ते — कटिबद्ध; शस्त्र-सम्पाते — बाण चलाने के लिए; धनुः — धनुष; उद्यम्य — ग्रहण करके, उठाकर; पाण्डवः — पाण्डुपुत्र ( अर्जुन ) ने; हृषीकेशम् — भगवान् कृष्ण से; तदा — उस समय; वाक्यम् — वचन; इदम् — ये; आह — कहे; मही-पते — हे राजा। 

तात्पर्य – उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठा कर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ। हे राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में खड़ा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे।

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।। 21।।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।। 22 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; सेनयोः — सेनाओं के; उभयोः — दोनों; मध्ये — बीच में ; रथम् — रथ को; स्थापय — कृपया खड़ा करें ; मे — मेरे; अच्युत — हे अच्युत; यावत् — जब तक; एतान् — इन सब; निरीक्षे — देख सकूँ ; अहम् — मैं ; योद्धु-कामान् — युद्ध की इच्छा रखने वालों को; अवस्थितान् — युद्ध भूमि में एकत्र; कैः — किन-किन से; मया — मेरे द्वारा; सह — एक साथ; योद्धव्यम् — युद्ध किया जाना है; अस्मिन् — इस; रण — संघर्ष, झगड़ा के; समुद्यमे — उद्यम या प्रयास में। 

तात्पर्य – अर्जुन ने कहा – हे अच्युत ! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें जिससे मैं यहाँ उपस्थित युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों की इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ।

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।। 23 ।।

योत्स्यमानान् — युद्ध करने वालों को; अवेक्षे — देखूँ ; अहम् — मैं ; ये — जो; एते — वे; अत्र — यहाँ; समागताः — एकत्र; धार्तराष्ट्रस्य — धृतराष्ट्र के पुत्र की; दुर्बुद्धेः — दुर्बुद्धि; युद्धे — युद्ध में ; प्रिय — मंगल, भला; चिकीर्षवः — चाहने वाले। 

तात्पर्य – मुझे उन लोगों को देखने दीजिये, जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र (दुर्योधन) को प्रसन्न करने की इच्क्षा से लड़ने के लिए आये हुए हैं।

इसे भी पढ़ें —

  1. 12 से 19 – दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि 
  2. 28 से 46 – मोह से व्याप्त अर्जुन के कथन 

सञ्जय उवाच —
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।। 24 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा; एवम् — इस प्रकार; उक्तः — कहे गये; हृषीकेशः — भगवान् कृष्ण ने; गुडाकेशेन — अर्जुन द्वारा; भारत — हे भरत के वंशज; सेनयोः — सेनाओं के; उभयोः — दोनों ; मध्ये — मध्य में ; स्थापयित्वा — खड़ा करके; रथ-उत्तमम् — उस उत्तम रथ को।  

तात्पर्य – संजय ने कहा – हे भरतवंशी ! अर्जुन द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किये जाने पर भगवान् कृष्ण ने दोनों दलों के बीच में उस उत्तम रथ को लाकर खड़ा कर दिया।

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आगे के श्लोक :-

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