Arjun Ke Saat Prashn Aur Unka Uttar / अर्जुन के सात प्रश्न

अध्याय आठ भगवत्प्राप्ति

Brahm, Adhyatm Aur Karmadi Ke Vishay Mein Arjun Ke Saat Prashn Aur Unka Uttar
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर

Brahm, Adhyatm Aur Karmadi Vishay Mein Arjun Ke Saat Prashn Aur Unka Uttar, ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर- अर्जुन ने कहा — हे भगवान् ! हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म क्या है ? आत्मा क्या है ? सकाम कर्म क्या है ? यह भौतिक जगत् क्या है ? तथा देवता क्या है ? कृपा करके यह सब मुझे बताइये। भगवान् ने कहा — अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है। जीवों के भौतिक शरीर से सम्बन्धित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है। 

श्लोक 1 से 7

अर्जुन उवाच —
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ।। 1 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; किम् — क्या; तत् — वह; ब्रह्म — ब्रह्म; किम् — क्या; अध्यात्मम् — आत्मा; किम् — क्या; कर्म — सकाम कर्म; पुरुष-उत्तम — हे परमपुरुष; अधिभूतम् — भौतिक जगत्; च — तथा; किम् — क्या; प्रोक्तम् — कहलाता है; अधि-देवम् — देवतागण; किम् — क्या; उच्यते — कहलाता है। 

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे भगवान् ! हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म क्या है ? आत्मा क्या है ? सकाम कर्म क्या है ? यह भौतिक जगत् क्या है ? तथा देवता क्या है ? कृपा करके यह सब मुझे बताइये।

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूधन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ।। 2 ।। 

अधियज्ञः — यज्ञ का स्वामी; कथम् — किस तरह; कः — कौन; अत्र — यहाँ; देहे — शरीर में; अस्मिन् — इस; मधुसूदन — हे मधुसूदन; प्रयाण-काले — मृत्यु के समय; च — तथा; कथम् — कैसे; ज्ञेयः असि — जाने जा सकते हो; नियत-आत्मभिः — आत्मसंयमी के द्वारा।

तात्पर्य — हे मधुसूदन ! यज्ञ का स्वामी कौन है और वह शरीर मैं कैसे रहता है ? और मृत्यु के समय भक्ति में लगे रहने वाले आपको कैसे जान पाते हैं ?

श्रीभगवानुवाच —
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते

भूतभावोभ्दवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।। 3 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा; अक्षरम् — अविनाशी; ब्रह्म — ब्रह्म; परमम् — दिव्य; स्वभावः — सनातन प्रकृति; अध्यात्मम् — आत्मा; उच्यते — कहलाता है; भूत-भाव-उद्भव-करः  — जीवों के भौतिक शरीर को उत्पन्न करने वाला; विसर्गः — सृष्टि; कर्म — सकाम कर्म; संज्ञितः — कहलाता है। 

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है। जीवों के भौतिक शरीर से सम्बन्धित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय तीन — कर्मयोग
  2. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  3. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  4. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ।। 4 ।।

अधिभूतम् — भौतिक जगत्; क्षरः — निरन्तर परिवर्तनशील; भावः — प्रकृति; पुरुषः — सूर्य, चंद्र जैसे समस्त देवताओं सहित विराट रूप; च — तथा; अधिदैवतम् — अधिदैव नामक; अधियज्ञः — परमात्मा; अहम् — मैं ( कृष्ण ); एव — निश्चय ही; अत्र — इस; देहे — शरीर में; देह-भृताम् — देहधारियों में; वर — हे श्रेष्ठ।

तात्पर्य — हे देहधारियों में श्रेष्ठ ! निरन्तर परिवर्तनशील यह भौतिक प्रकृति अधिभूत ( भौतिक अभिव्यक्ति ) कहलाती है।  भगवान् का विराट रूप, जिसमें सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवता सम्मिलित हैं, अधिदैव कहलाता है। तथा प्रत्येक देहधारी के हृदय में परमात्मा स्वरुप स्थित मैं परमेश्वर अधियज्ञ ( यज्ञ का स्वामी ) कहलाता हूँ।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। 5 ।।

अन्त-काले — मृत्यु के समय; च — भी; माम् — मुझको; एव — निश्चय ही; स्मरन् — स्मरण करते हुए; मुक्त्वा — त्याग कर; कलेवरम् — शरीर को; यः — जो; प्रयाति — जाता है; सः — वह; मत्-भावम् — मेरे स्वभाव को; याति — प्राप्त करता है; न — नहीं; अस्ति — है; अत्र — यहाँ; संशयः — सन्देह। 

तात्पर्य — और जीवन के अन्त में जो केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह तुरन्त मेरे स्वभाव को प्राप्त करता है। इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं है।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।। 6 ।।

यम् यम् — जिस; वा अपि — किसी  भी;स्मरन् — स्मरण करते हुए; भावम् — स्वभाव को; त्यजति — परित्याग करता है; अन्ते — अन्त में; कलेवरम् — शरीर को; तम् तम् — वैसा ही; एव — निश्चय ही; एति — प्राप्त करता है; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; सदा — सदैव; तत् — उस; भाव — भाव; भावितः — स्मरण करता हुआ। 

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस-उस भाव को निश्चत रूप से प्राप्त होता है।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
म्ययर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ।। 7 ।।

तस्मात् — अतएव; सर्वेषु — समस्त; कालेषु — कालों में; माम् — मुझको; अनुस्मर — स्मरण करते हुए; युध्य — युद्ध करो; च — भी; मयि — मुझमें; अर्पित — शरणागत होकर; मनः — मन; बुद्धिः — बुद्धि; माम् — मुझको; एव — निश्चय ही; एष्यसि — प्राप्त करोगे; असंशयः — निस्सन्देह ही। 

तात्पर्य — अतएव, हे अर्जुन ! तुम्हें सदैव कृष्ण रूप में मेरा चिन्तन करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के कर्तवय को भी पूरा करना चाहिए। अपने कर्मों को मुझे समर्पित करके तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझमें स्थिर करके तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर सकोगे।

आगे के श्लोक :–

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