Arjun Ki Kayarta Ke Vishay / अर्जुन की कायरता के विषय

अध्याय दो गीता का सार

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein Srikrishnarjun Samwad
अर्जुन की कायरता के विषय में श्रीकृष्णार्जुन संवाद

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein Srikrishnarjun Samwad, अर्जुन की कायरता के विषय में श्रीकृष्णार्जुन संवादश्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन ! तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है, जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है। ऐसे महापुरुषों को जो मेरे गुरु हैं, उन्हें मार कर जीने की अपेक्षा इस संसार में भीख माँग कर खाना अच्छा है।

श्लोक 1 से 10

सञ्जय उवाच  —
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ।। 1 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा ; तम् — अर्जुन के प्रति ; तथा — इस प्रकार ; कृपया — करुणा से ; आविष्टम् — अभिभूत ; अश्रु-पूर्ण-आकुल — अश्रुओं से पूर्ण ; ईक्षणम् — नेत्र ; विषीदन्तम् — शोकयुक्त ; इदम् — यह ; वाक्यम् — वचन ; उवाच — कहा ; मधु-सूदनः — मधु का वध करने वाले ( कृष्ण ) ने ।    

तात्पर्य – संजय ने कहा – करुणा से व्याप्त, शोकयुक्त, अश्रुपूरित नेत्रों अर्जुन को देख कर मधुसूदन कृष्ण ने ये शब्द कहे।

श्रीभगवानुवाच  —
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।। 2 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा ; कुतः — कहाँ से ; त्वा — तुमको ; कश्मलम् — गन्दगी, अज्ञान ; इदम् — यह शोक ; विषमे — इस विषम अवसर पर ; समुपस्थितम् — प्राप्त हुआ ; अनार्य — वे लोग जो जीवन के मूल्य को नहीं समझते ; जुष्टम् — आचरित ; अस्वर्ग्यम् — उच्च लोकों को जो न ले जाने वाला; अकीर्ति — अपयश का ; करम् — कारण ; अर्जुन — हे अर्जुन ।   

तात्पर्य – श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन ! तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है, जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है।

क्लैब्यं सा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्तोत्तिष्ठा परन्तप ।। 3 ।।

क्लैब्यम् — नपुंसकता ; मा स्म — मत ; गमः — प्राप्त हो ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; न — कभी नहीं ; एतत् —  यह ; त्वयि — तुमको ; उपपद्यते — शोभा देता है ; क्षुद्रम् — तुच्छ ; हृदय — हृदय की ; दौर्बल्यम् — दुर्बलता ; त्यक्त्वा — त्याग कर ; उत्तिष्ठ — खड़ा हो ; परन्तप — हे शत्रुओं का दमन करने वाले । 

तात्पर्य – हे पृथापुत्र ! इस हीन नपुंसकता को प्राप्त मत होओ। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे शत्रुओं के दमनकर्ता ! ह्रदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े होओ।

अर्जुन उवाच —
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।। 4 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा ; कथम् — किस प्रकार ; भीष्मम् — भीष्म को ; अहम् — मैं ; संख्ये — युद्ध में ; द्रोणम् — द्रोण को ; च — भी ; मधु-सूदन — हे मधु के संहारकर्ता ; इषुभिः — तीरों से ; प्रतियोत्स्यामि — उलट कर प्रहार करूँगा ; पूजा-अर्हाै — पूजनीय ; अरि-सूदन — हे शत्रुओं के संहारक ।  

तात्पर्य – अर्जुन ने कहा ! हे शत्रुहन्ता ! हे मधुसूदन ! मैं युद्धभूमि में किस तरह भीष्म तथा द्रोण जैसे पूजनीय व्यक्तियों पर उलट कर बाण चलाऊँगा?

इसे भी पढ़ें —

  1. श्रीमद्भगवद्गीता यथारुप हिंदी में
  2. अध्याय एक — कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में
  3. अध्याय दो — गीता का सार
  4. 11 से 30 — सांख्ययोग का विषय

गुरूनहत्वा ही महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुम् भैक्ष्यम्पीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ।। 5 ।।

गुरुन् — गुरुजनों को ; अहत्वा — न मार कर ; हि — निश्चय ही ; महा-अनुभावान् — महापुरुषों को ; श्रेयः — अच्छा है ; भोक्तुम् — भोगना ; भैक्ष्यम् — भीख माँगकर ; अपि — भी; इह — इस जीवन में ; लोके — इस संसार में ; हत्वा — मारकर; अर्थ — लाभ की ; कामान् — इच्छा से ; तु — लेकिन ; गुरुन् — गुरुजनों को ; इह — इस संसार में ; एव — निश्चय ही ; भुञ्जीय — भोगने के लिए बाध्य ; भोगान् — भोग्य वस्तुएँ ; रुधिर — रक्त से ; प्रदिग्धान् — सनी हुई, रंजित ।    

तात्पर्य – ऐसे महापुरुषों को जो मेरे गुरु हैं, उन्हें मार कर जीने की अपेक्षा इस संसार में भीख माँग कर खाना अच्छा है। भले ही वे सांसारिक लाभ के इच्छुक हों, किन्तु हैं तो गुरुजन ही ! यदि उनका वध होता है तो हमारे द्वारा भोग्य प्रत्येक वस्तु उनके रक्त से सनी होगी।

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।। 6 ।।

न — नहीं ; च — भी ; एतत् — यह ; विद्मः — हम जानते हैं ; कतरत् — जो ; न — हमारे लिए ; गरीयः — श्रेष्ठ ; यत् वा — अथवा ; जयेम — हम जीत जाएँ ; यदि — यदि ; वा — या ; नः — हमको ; जयेयुः — वे जीतें ; यान् — जिनको ; एव — निश्चय ही ; हत्वा — मारकर ; न — कभी नहीं ; जिजीविषामः — हम जीना चाहेंगे ; ते — वे सब ; अवस्थिताः — खड़े हैं ; प्रमुखे — सामने ; धार्तराष्ट्राः — धृतराष्ट्र के पुत्र ।  

तात्पर्य – हम यह भी नहीं जानते की हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है – उनको जीतना या उनके द्वारा जीते जाना। यदि हम धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध कर देते हैं तो हमें जीवित रहने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी वे युद्धभूमि में हमारे समक्ष खड़े हैं।

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