Asuri Sampada Valon Ke Lakshan / आसुरी सम्पदा वालों

अध्याय सोलह दैवी तथा आसुरी स्वभाव

Asuri Sampada Valon Ke Lakshan Aur Unki Adhogati Ka Kathan
आसुरी सम्पदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन

Asuri Sampada Valon Ke Lakshan Aur Unki Adhogati Ka Kathan, आसुरी सम्पदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन- आसुरी व्यक्ति सोचता है, आज मेरे पास इतना धन है और अपनी योजनाओं से मैं और अधिक धन कमाऊँगा। इस समय मेरे पास इतना है, किन्तु भविष्य में यह बढ़कर और अधिक हो जायेगा। वह मेरा शत्रु है और मैंने उसे मार दिया है और मेरे अन्य शत्रु भी मार दिए जाएंगे। मैं सभी वस्तुओं का स्वामी हूँ। मैं भोक्ता हूँ।

श्लोक 6 से 20

द्वौ भूतसर्गाै लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
देवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ।। 6 ।।

द्वौ — दो ; भूत-सर्गाै — जीवों की सृष्टियाँ ; लोके — संसार में ; अस्मिन् — इस ; देवः — दैवी ; आसुरः — आसुरी ; एव — निश्चय ही ; च — तथा ; दैवः — दैवी ; विस्तरशः — विस्तार से ; प्रोक्तः — कहा गया ; आसुरम् — आसुरी ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; मे — मुझसे ; शृणु — सुनो ।

तात्पर्य — हे पृथापुत्र ! इस संसार में सृजित प्राणी दो प्रकार के हैं — दैवी तथा आसुरी । मैं पहले ही विस्तार से तुम्हें दैवी गुण बतला चूका हूँ। अब मुझसे आसुरी गुणों के विषय में सुनो ।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ।। 7 ।।

प्रवृत्तिम् — ठीक से कर्म करना ; च — भी ; निवृत्तिम् — अनुचित ढंग से कर्म न करना ; च — तथा ; जनाः — लोग ; न — कभी नहीं ; विदुः — जानते ; आसुराः — आसुरी गुण के ; न — कभी नहीं ; शौचम् — पवित्रता ; न — न तो ; अपि — भी ; च — तथा ; आचारः — आचरण ; न — कभी नहीं ; सत्यम् — सत्य ; तेषु — उनमें ; विद्यते — होता है ।

तात्पर्य — जो आसुरी हैं, वे यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न ही सत्य पाया जाता है ।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ।। 8 ।।

असत्यम् — मिथ्या ; अप्रतिष्ठम् — आधाररहित ; ते — वे ; जगत् — दृश्य जगत् ; आहुः — कहते हैं ; अनीश्वरम् — बिना नियामक के ; अपरस्पर — बिना कारण के ; सम्भूतम् — उत्पन्न ; किम्-अन्यत् — अन्य कोई कारण नहीं है ; काम-हैतुकम् — केवल काम के कारण ।

तात्पर्य — वे कहते हैं कि यह जगत् मिथ्या है, इसको कोई आधार नहीं है और इसका नियमन किसी ईश्वर द्वारा नहीं होता। उनका कहना है कि यह कामेच्छा से उत्पन्न होता है काम के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं है ।

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ।। 9 ।।

एताम् — इस ; दृष्टिम् — दृष्टि को ; अवष्टभ्य — स्वीकार करके ; नष्ट — खोकर ; आत्मानः — अपने आप ; अल्प-बुद्धयः — अल्पज्ञानी ; प्रभवन्ति — फूलते-फलते हैं ; उग्र-कर्माणः — कष्टकारक कर्मों में प्रवृत्त ; क्षयाय — विनाश के लिए ; जगतः — संसार का ; अहिताः — अनुपयोगी ।

तात्पर्य — ऐसे निष्कर्षों का अनुगमन करते हुए आसुरी लोग, जिन्होंने आत्म-ज्ञान खो दिया है और जो बुद्धिहीन हैं, ऐसे अनुपयोगी एवं भयावह कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, जो संसार का विनाश करने के लिए होता है ।

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  2. अध्याय सोलह — दैवी तथा आसुरी स्वभाव
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काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्त्तन्तेऽश्रुचिव्रताः ।। 10 ।।

कामम् — काम, विषयभोग की ; आश्रित्य — शरण लेकर ; दुष्पूरम् — अपूरणीय, अतृप्त ; दम्भ — गर्व ; मान — तथा झूठी प्रतिष्ठा का ; मद-अन्विताः — मद में चूर ; मोहात् — मोह से ; गृहीत्वा — ग्रहण करके ; असत् — क्षणभंगुर ; ग्राहान् — वस्तुओं को ; प्रवर्तन्ते — फलते-फूलते हैं ; अश्रूचि — अपवित्र ; व्रताः — व्रत लेने वाले ।

तात्पर्य — कभी न सन्तुष्ट होने वाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवं मिथ्या प्रतिष्ठा में डुबे हुए आसुरी लोग इस तरह मोहग्रस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिए रहते हैं ।

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ।। 11 ।।

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ।। 12 ।।

चिन्ताम् — भय तथा चिन्ताओं का ; अपरिमेयाम् — अपार ; च — तथा ; प्रलय-अन्ताम् — मरणकाल तक ; उपाश्रिताः — शरणागत ; काम-उपभोग — इन्द्रियतृप्ति ; परमाः — जीवन का परम लक्ष्य ; एतावत् — इतना ; इति — इस प्रकार ; निश्चिताः — निश्चित करके ; आशा-पाश — आशा, रूप बन्धन ; शतैः — सैकड़ों के द्वारा ; बद्धाः — बँधे हुए ; काम — काम ; क्रोध — तथा क्रोध में ; परायणाः — सदैव स्थित ; ईहन्ते — इच्छा करते हैं ; काम — काम ; भोग — इन्द्रियभोग ; अर्थम् — के निमित्त ; अन्यायेन — अवैध रुप से ; अर्थ — धन का ; सञ्चयान् — संग्रह ।

तात्पर्य — उनका विश्वास है कि इन्द्रियों की तुष्टि ही मानव सभ्यता की मूल आवश्यकता है। इस प्रकार मरणकाल तक उनको अपार चिन्ता होती रहती है। वे लाखों इच्छाओं के जाल में बँधकर तथा काम और क्रोध में लीन होकर इन्द्रियतृप्ति के लिए अवैध ढंग से धनसंग्रह करते हैं ।

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ।। 13 ।।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ।। 14 ।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ।। 15 ।।

इदम् — यह ; अद्य — आज ; मया — मेरे द्वारा ; लब्धम् — प्राप्त ; इमम् — इसे ; प्राप्स्ये — प्राप्त करूँगा ; मनः-रथम् — इच्छित ; इदम् — यह ; अस्ति — है ; इदम् — यह ; अपि — भी ; मे — मेरा ; भविष्यति — भविष्य में बढ़ जायगा ; पुनः — फिर ; धनम् — धन ; असौ — वह ; मया — मेरे ; हतः — मारा गया ; शत्रुः — शत्रु ; हनिष्ये — मारूँगा ; च — भी ; अपरान् — अन्यों को ; अपि — निश्चय ही ; ईश्वरः — प्रभु, स्वामी ; अहम् — मैं हूँ ; बल-वान् — शक्तिशाली ; सुखी — प्रसन्न ; आढ्यः — धनी ; अभिजन-वान् — कुलीन सम्बन्धियों से घिरा ; अस्मि — मैं हूँ ; कः — कौन ; अन्यः — दूसरा ; अस्ति — है ; सदृशः — समान ; मया — मेरे द्वारा ; यक्ष्मे — मैं यज्ञ करूँगा ; दास्यामि — दान दूँगा ; मोदिष्ये — आमोद-प्रमोद मनाऊँगा ; इति — इस प्रकार ; अज्ञान — अज्ञानतावश ; विमोहिताः — मोहग्रस्त ।

तात्पर्य — आसुरी व्यक्ति सोचता है, आज मेरे पास इतना धन है और अपनी योजनाओं से मैं और अधिक धन कमाऊँगा। इस समय मेरे पास इतना है, किन्तु भविष्य में यह बढ़कर और अधिक हो जायेगा। वह मेरा शत्रु है और मैंने उसे मार दिया है और मेरे अन्य शत्रु भी मार दिए जाएंगे। मैं सभी वस्तुओं का स्वामी हूँ। मैं भोक्ता हूँ। मैं सिद्ध, शक्तिमान् तथा सुखी हूँ। मैं सबसे धनी व्यक्ति हूँ और मेरे आसपास मेरे कुलीन सम्बन्धी हैं। कोई अन्य मेरे समान शक्तिमान तथा सुखी नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और इस तरह आनन्द मनाऊँगा। इस प्रकार ऐसे व्यक्ति अज्ञानवश मोहग्रस्त होते रहते हैं ।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽश्रुचौ ।। 16 ।।

अनेक — कई ; चित्त — चिन्ताओं से ; विभ्रान्ताः — उद्विग्न ; मोह — मोह में ; जाल — जाल से ; समावृताः — घिरे हुए ; प्रसक्ताः — आसक्त ; काम-भोगेषु — इन्द्रियतृप्ति में ; पतन्ति — गिर जाते हैं ; नरके — नरक में ; अश्रुचौ — अपवित्र ।

तात्पर्य — इस प्रकार अनेक चिन्ताओं से उद्विग्न होकर तथा मोहजाल में बँधकर वे इन्द्रियभोग में अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं और नरक में गिरते हैं ।

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