Asuri Swabhav Valon Ki Ninda / आसुरी स्वभाव वालों

अध्याय सात भगवद्ज्ञान

Asuri Swabhav Valon Ki Ninda Aur Bhagwadbhakton Ki Prashansa
आसुरी स्वभाव वालों की निन्दा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा

Asuri Swabhav Valon Ki Ninda Aur Bhagwadbhakton Ki Prashansa, आसुरी स्वभाव वालों की निन्दा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा- तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता। प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है। किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं। 

श्लोक 13 से 19

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ।। 13 ।।

त्रिभिः — तीन; गुण-मयैः — गुणों से युक्त; भावैः — भावों के द्वारा; एभिः — इन; सर्वम् — सम्पूर्ण; इदम् — यह; जगत् — ब्रह्माण्ड; मोहितम् — मोहग्रस्त; न अभिजानाति — नहीं जानता; माम् — मुझको; एभ्यः — इनसे; परम् — परम; अव्ययम् — अव्यय, सनातन। 

तात्पर्य — तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता।

 दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।। 14 ।।

दैवी — दिव्य; हि — निश्चय ही; एषा — यह; गुण-मयी — तीनों गुणों से युक्त; मम — मेरी; माया — शक्ति; दुरत्यया — पार कर पाना कठिन, दुस्तर; माम् — मुझे; एव — निश्चय ही; ये — जो; प्रपद्यन्ते — शरण ग्रहण करते हैं, मायाम् एताम् — इस माया के; तरन्ति — पार कर जाते हैं, ते — वे।

तात्पर्य — प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है। किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं।

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ।। 15 ।।

न — नहीं; माम् — मेरी; दुष्कृतिनः — दुष्ट; मूढाः — मूर्ख; प्रपद्यन्ते — शरण ग्रहण करते हैं; नर-अधमाः — मनुष्यों में अधम; मायया — माया के द्वारा; अपहृत — चुराये गये; ज्ञानाः — ज्ञान वाले; आसुरम् — आसुरी; भावम् — प्रकृति या स्वभाव को; आश्रिताः — स्वीकार किये हुए। 

तात्पर्य — जो निपट मुर्ख हैं, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है तथा जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करने वाले हैं, ऐसे दुष्ट मेरी शरण ग्रहण नहीं करते।

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  1. अध्याय एक — कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल
  2. अध्याय तीन — कर्मयोग
  3. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  4. 8 से 12 — भगवान् की व्यापकता का कथन

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनो ऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।। 16 ।।

चतुः-विधाः — चार प्रकार के; भजन्ते — सेवा करते हैं; माम् — मेरी; जनाः — व्यक्ति; सु-कृतिनः — पुण्यात्मा; अर्जुन — हे अर्जुन; आर्तः — विपदाग्रस्त, पीड़ित; जिज्ञासुः — ज्ञान  जिज्ञासु; अर्थ-अर्थी — लाभ की इच्छा रखने वाले; ज्ञानी — वस्तुओं को सही रूप में जानने वाले, तत्त्वज्ञ; च — भी; भरत-ऋषभ — हे भरतश्रेष्ठ।

तात्पर्य — हे भरतश्रेष्ठ ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं — आर्त, जिज्ञासु, अर्थाथी तथा ज्ञानी।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते
प्रियो हि ज्ञानिनो ऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।। 17 ।।

तेषाम् — उनमें से; ज्ञानी — ज्ञानवान; नित्य-युक्तः — सदैव तत्पर; एक — एकमात्र; भक्तिः — भक्ति में; विशिष्यते — विशिष्ट है; प्रियः — अतिशय प्रिय; हि — निश्चय ही; ज्ञानिनः — ज्ञानवान का; अत्यर्थम् — अत्यधिक; अहम् — मैं हूँ; सः — वह; च — भी; मम — मेरा; प्रियः — प्रिय।

तात्पर्य — इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है, वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ।। 18 ।। 

उदाराः — विशाल हृदय वाले; सर्वे — सभी; एव — निश्चय ही; एते — ये; ज्ञानी — ज्ञानवाला; तु — लेकिन; आत्मा एव — मेरे समान ही; मे — मेरे; मतम् — मत में; आस्थितः — स्थित; सः — वह; हि — निश्चय ही; युक्त-आत्मा — भक्ति में तत्पर; माम् — मुझ; एव — निश्चय ही; अनुत्तमाम् — परम, सर्वोच्च; गतिम् — लक्ष्य को।

तात्पर्य — निस्सन्देह ये सब उदारचेता व्यक्ति हैं, किन्तु जो मेरे ज्ञान को प्राप्त है, उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ। वह मेरी दिव्यसेवा में तत्पर रहकर मुझ सर्वोच्च उद्देश्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।। 19 ।।

बहूनाम् — अनेक; जन्मनाम् — जन्म तथा मृत्यु के चक्र के; अन्ते — अन्त में; ज्ञान-वान् — ज्ञानी; माम् — मेरी; प्रपद्यते — शरण ग्रहण करता है; वासुदेवः — भगवान् कृष्ण; सर्वम् — सब कुछ; इति — इस प्रकार; सः — ऐसा; महा-आत्मा — महात्मा; सु-दुर्लभः — अत्यन्त दुर्लभ है। 

तात्पर्य — अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है, वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।

आगे के श्लोक :–

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