Vedoktam Ratri Suktam / वेदोक्तं रात्रि सूक्तम्

Ath Vedoktam Ratri Suktam
अथ वेदोक्तं रात्रि सूक्तम्

Ath Vedoktam Ratri Suktam, अथ वेदोक्तं रात्रि सूक्तम्- इसके अनन्तर रात्रिसूक्त का पाठ करना उचित है। पाठ के आरम्भ में रात्रिसूक्त और अन्त में देवी सूक्त के पाठ की विधि है। मारीच कल्प का वचन है —

रात्रिसूक्तं पठेदादौ मध्ये सप्तशतीस्तवम् ।
प्रान्ते तु पठनीयं वै देवीसूक्तमिति क्रमः ।।

रात्रिसूक्त के बाद विनयोग, न्यास और ध्यानपूर्वक नवार्ण मन्त्र का जप करके सप्तशती का पाठ आरम्भ करना चाहिये। पाठ के अन्त में पुनः विधिपूर्वक नवार्ण मन्त्र का  जप करके देवी सूक्त का तथा तीनों रहस्यों का पाठ करना उचित है। कोई-कोई नवार्ण जप के बाद रात्रिसूक्त का पाठ बतलाते हैं तथा अन्त में भी देवीसूक्त के बाद नवार्ण जप का औचित्य प्रतिपादन करते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं है। चिदम्बर संहिता में कहा है — ‘ मध्ये नवार्णपुटितं कृत्वा स्तोत्रं सदाभ्यसेत्। ‘ अर्थात् सप्तशती का पाठ बीच में हो और आदि-अन्त में नवार्ण जप से उसे सम्पुटित कर दिया जाय। डामर तन्त्र में यह बात अधिक स्पष्ट कर दी गयी है —

शतमादौ शतं चान्ते जपेन्मंत्रं नवार्णकम्
चण्डीं सप्तशतीं मध्ये सम्पुटो यमुदाहृतः ।।

अर्थात् आदि और अन्त में सौ-सौ बार नवार्ण मन्त्र का जप करे और मध्य में सप्तशती दुर्गा पाठ करे ; यह सम्पुट कहा गया है। यदि आदि-अन्त में रात्रिसूक्त और देवीसूक्त का पाठ हो और उसके पहले एवं अन्त में नवार्ण-जप हो, तब तो वह पाठ नवार्ण-सम्पुटित नहीं कहला सकता ; क्योंकि जिससे सम्पुट हो उसके मध्य में अन्य प्रकार के मन्त्र का प्रवेश नहीं होना चाहिये। यदि बीच में रात्रिसूक्त में और देवीसूक्त रहेंगे तो वह पाठ उन्हीं से सम्पुटित कहलायेगा ; ऐसी दशा में डामर तन्त्र आदि के वचनों से स्पष्ट ही विरोध होगा। अतः पहले रात्रिसूक्त, फिर नवार्ण-जप, फिर न्यासपूर्वक सप्तशती-पाठ, फिर विधिवत् नवार्ण-जप, फिर क्रमशः देवीसूक्त एवं रहस्य-त्रय का पाठ — यही क्रम ठीक है।

रात्रिसूक्त भी दो प्रकार है — वैदिक और तान्त्रिक। वैदिक रात्रिसूक्त ऋग्वेद की आठ ऋचाएँ हैं और तान्त्रिक तो दुर्गासप्तशती के प्रथमाध्याय में ही है। यहाँ दोनों दिये जाते हैं। रात्रिदेवता के प्रतिपादक सूक्त को रात्रिसूक्त कहते हैं। यह रात्रिदेवी दो प्रकार की हैं — एक जीवरात्रि और दूसरी ईश्वररात्रि। जीवरात्रि वही है, जिसमें प्रतिदिन जगत् के साधारण जीवों का व्यवहार लुप्त होता है। दूसरी ईश्वररात्रि वह है, जिसमें ईश्वर के जगद्रूप व्यवहार का लोप होता है ; उसी को कालरात्रि या महाप्रलयरात्रि कहते हैं। उस समय केवल ब्रह्म और उसकी मायाशक्ति, जिसे अव्यक्त प्रकृति कहते हैं, शेष रहती है। इसकी अधिष्ठात्री देवी ‘ भुवनेश्वरी ‘ है। रात्रिसूक्त से उन्हीं का स्तवन होता है।

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  1. देव्याः कवचम्
  2. कीलकम्

ॐ रात्रीत्याद्यष्टर्चस्य सूक्तस्य कुशिकः सौभरो रात्रिर्वा भारद्वाजो ऋषिः , रात्रिर्देवता , गायत्री छन्दः , देवीमाहात्म्यपाठे विनियोगः।

ॐ रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः।
विश्वा अधि श्रियो धित ।। 1 ।।

महत्तत्त्वादिरूप व्यापक इन्द्रियों से सब देशों में समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली ये रात्रिरूपा देवी अपने उत्पन्न किये हुए जगत् के जीवों के शुभाशुभ कर्मों को विशेष रूप से देखती हैं और उनके अनुरूप फल की व्यवस्था करने के लिये समस्त विभूतियों को धारण करती है।

 ओर्वप्रा अमर्त्यानिवतो देव्युद्वतः ।
ज्योतिषा बाधते तमः ।। 2 ।।

ये देवी अमर हैं और सम्पूर्ण विश्व को, नीचे फैलने वाली लता आदि को तथा ऊपर बढ़ने वाले वृक्षों को भी व्याप्त करके स्थित हैं ; इतना ही नहीं, ये ज्ञानमयी ज्योति से जीवों के अज्ञानान्धकार का नाश कर देती हैं।

निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती ।
अपेदु हासते तमः ।। 3 ।।

परा चिच्छक्तिरूपा रात्रि देवी आकर अपनी बहिन ब्रह्मविद्यामयी उषादेवी को प्रकट करती हैं, जिससे अविद्यामय अन्धकार स्वतः नष्ट हो जाता है।

सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि ।
वृक्षे न वस्तिं वयः ।। 4 ।।

वे रात्रिदेवी इस समय मुझपर प्रसन्न हों, जिनके आने पर हमलोग अपने घरों में सुख से सोते हैं — ठीक वैसे ही, जैसे रात्रि के समय पक्षी वृक्षों पर बनाये हुए अपने घोंसलों में सुखपूर्वक शयन करते हैं।

नि ग्रामासो अविक्षत न पद्वन्तो नि पक्षिणः ।
नि श्येनासश्चिदर्थिनः ।। 5 ।।

उस करुणामयी रात्रिदेवी के अंक में सम्पूर्ण ग्रामवासी मनुष्य, पैरों से चलने वाले गाय, घोड़े आदि पशु, पंखों से उड़ने वाले पक्षी एवं पतंग आदि, किसी प्रयोजन से यात्रा करने वाले पथिक और बाज आदि भी सुखपूर्वक सोते हैं।

 यावया वृक्यं वृकं यवय स्तेनमूम्र्ये ।
अथा नः सुतरा भव ।। 6 ।।  

हे रात्रिमयी चिच्छक्ति ! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को हमसे अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदनन्तर हमारे लिये सुखपूर्वक तरने योग्य हो जाओ — मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ।

उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित।
उष ऋणेव यातय ।। 7 ।।

हे उषा ! हे रात्रि की अधिष्ठात्री देवी ! सब ओर फैला हुआ यह अज्ञानमय काला अन्धकार मेरे निकट आ पहुँचा है। तुम इसे ऋण की भाँति दूर करो — जैसे धन देकर अपने भक्तों के ऋण दूर करती हो, उसी प्रकार ज्ञान देकर इस अज्ञान को भी हटा दो।

 उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः ।
रात्रि स्तोमं न जिग्युषे ।। 8 ।।

हे रात्रिदेवी ! तुम दूध देने वाली गौ के समान हो। मैं तुम्हारे समीप आकर स्तुति आदि से तुम्हें अपने अनुकूल रहता हूँ। परम व्योमस्वरूप परमात्मा की पुत्री ! तुम्हारी कृपा से मैं आदि शत्रुओं को जीत चुका हूँ, तुम स्तोम की भाँति मेरे इस हविष्य को ग्रहण करो ।

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