Kashi Panchakam / काशी पंचकम्

Kashi Panchakam

Kashi Panchakam, काशी पंचकम् :- काशी में ही सब कुछ प्रकाशित होता है, काशी ही सबको प्रकाशित करने वाली है, उस आत्म प्रकाश स्वरूपा काशी को जिसने जान लिया, उसने ही सचमुच काशी को प्राप्त किया। मेरा शरीर ही काशी क्षेत्र है, मेरा चैतन्य (ज्ञान) त्रिभुवनजननी सर्वव्यापिनी गंगा है। मेरी यह भक्ति और श्रद्धा गयातीर्थ है तथा गुरुचरणों में ध्यान लगाना ही प्रयागराज है। मेरी आत्मा ही भगवान् विश्वनाथ हैं, जो सभी प्राणियों के अन्तरात्मा तथा चित्त के साक्षी हैं। जब मेरे देह में ही इन सबका निवास है, तब अन्य तीर्थों से क्या प्रयोजन ?

Shri Vindhyeshwari Stotram / श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम्

Shri Vindhyeshwari Stotram

Shri Vindhyeshwari Stotram, श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् :- ऋषिश्रेष्ठ के यहाँ पुत्री रूप से प्रकट होनेवाली, ज्ञानलोक प्रदान करने वाली; महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती रूप से तीन स्वरूपों को धारण करने वाली और जल तथा स्थल में निवास करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ। इन्द्र आदि देवताओं से सेवित, मुर आदि राक्षसों के वंश का नाश करने वाली तथा अत्यन्त निर्मल बुद्धि प्रदान करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ।

Shri Annapurna Mahatmya / श्री अन्नपूर्णा माहात्म्य

Shri Annapurna Mahatmya

Shri Annapurna Mahatmya, श्री अन्नपूर्णा माहात्म्य :- जब तक देवी अन्नपूर्णा कृपा नहीं करतीं, तभी तक मनुष्य लालची होकर (टुकड़े-टुकड़े के लिये) लालायित होता है और दीन तथा मलिनमुख हो द्वार-द्वार पर बिलबिलाता रहता है, परंतु उसके मन की चिन्ता दूर नहीं होती; श्राद्ध, विवाह अथवा कोई उत्सव तो नहीं, इस बात की टोह में रहता है, चंचल होकर इधर-उधर घूमता है और यदि कहीं ढोल या तुरही का शब्द होता है

Shri Annapurna Stotram / श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम्

Shri Annapurna Stotram

Shri Annapurna Stotram, श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम् :- आप कोटि-कोटि चन्द्र-सूर्य-अग्नि के समान जाज्वल्यमान प्रतीत होती हैं, आप चन्द्रकिरणों के समान [शीतल] तथा बिम्बाफल के समान रक्त-वर्ण के अधरोष्ठवाली हैं, चन्द्र-सूर्य तथा अग्नि के समान प्रकाशमान केश धारण करने वाली हैं, आप चन्द्रमा तथा सूर्य के समान देदीप्यमान वर्णवाली ईश्वरी हैं, आपने [अपने हाथों में] माला, पुस्तक, पाश तथा अंकुश धारण कर रखा है, आप काशीपुरी की अधीश्वरी हैं, अपनी कृपा का आश्रय देनेवाली हैं, आप [समस्त प्राणियों की] माता हैं; आप भगवती अन्नपूर्णा हैं, मुझे भिक्षा प्रदान करें।

Shri Gayatri Stuti / श्री गायत्री स्तुति

Shri Gayatri Stuti

Shri Gayatri Stuti, श्री गायत्री स्तुति :- सर्वगे ! आप सम्पूर्ण प्राणियों की अधिष्ठात्री हैं। स्वाहा और स्वधा आपकी ही प्रतिकृतियाँ हैं; अतः आपको मेरा नमस्कार है। महान् दैत्यों का दलन करनेवाली देवि ! आप सभी प्रकार से परिपूर्ण हैं। आपके मुख की आभा पूर्णचन्द्र के समान है। आपके शरीर से महान् तेज छिटक रहा है। आपसे ही यह सारा विश्व प्रकट होता है। आप महाविद्या और महावेद्या हैं। आनन्दमयी देवि !

Shri Radha Ashtakam / श्री राधा अष्टकम्

Shri Radha Ashtakam

Shri Radha Ashtakam, श्री राधा अष्टकम् :- श्रीराधिके ! यद्यपि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण स्वयं ही ऐसे हैं कि उनके चारुचरणों का चिन्तन किया जाय, तथापि वे तुम्हारे चरणचिह्नों के अवलोकन की बड़ी लालसा रखते हैं। देवि ! मैं नमस्कार करता हूँ। इधर मेरे अन्तःकरण के हृदय-देश में ज्योतिपुंज बिखेरते हुए अपने चिन्तनीय चरणारविन्द का मुझे दर्शन कराओ। दामोदर प्रिया श्रीराधा की स्तुति से सम्बन्ध रखने वाले इन आठ श्लोकों का जो लोग सदा इसी रूप में पाठ करते हैं, वे श्रीकृष्णधाम वृन्दावन में युगल सरकार की सेवा के अनुकूल सखी-शरीर पाकर सुख से रहते हैं।

Shri Radha Stotram / श्री राधा स्तोत्रम्

Shri Radha Stotram

Shri Radha Stotram, श्री राधा स्तोत्रम् :- जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस उद्धवकृत स्तोत्र का पाठ करता है; वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वैकुण्ठ में जाता है। उसे बन्धुवियोग तथा अत्यन्त भयंकर रोग और शोक नहीं होते। जिस स्त्री का पति परदेश गया होता है, वह अपने पति से मिल जाती है और भार्यावियोगी अपनी पत्नी को पा जाता है। पुत्रहीन को पुत्र मिल जाते हैं, निर्धन को धन प्राप्त हो जाता है, भूमिहीन को भूमि की प्राप्ति हो जाती है, प्रजाहीन प्रजा को पा लेता है, रोगी रोग से विमुक्त हो जाता है।

Radha Shodash Naam Stotram / राधा षोडश नाम स्तोत्रम्

Radha Shodash Naam Stotram

Radha Shodash Naam Stotram, राधा षोडश नाम स्तोत्रम् :- नियमपूर्वक किये गये सम्पूर्ण व्रत, दान और उपवास से, चारों वेदों के अर्थसहित पाठ से, समस्त यज्ञों और तीर्थों के विधिबोधित अनुष्ठान तथा सेवन से, सम्पूर्ण भूमि की सात बार की गयी परिक्रमा से, शरणागत की रक्षा से, अज्ञानी को ज्ञान देने से तथा देवताओं और वैष्णवों का दर्शन करने से भी जो फल प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्रपाठ की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है। इस स्तोत्र के प्रभाव से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।

Sita Stuti / सीता स्तुति

Sita Stuti

Sita Stuti, सीता स्तुति :- हे जानकी माता ! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ. उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरूपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है। उनकी आदत भूल जाने की है, जिसका कहीं मान नहीं होता, उसको वह मान दिया करते हैं; पर वह भी भूल जाते हैं। हे माता ! तुम उनसे कहना कि तुलसीदास को न भूलिये; क्योंकि उसे मन, वचन और कर्म से स्वप्न में भी किसी दूसरे का आश्रय नहीं है।

Shri Sita Stuti / श्री सीता स्तुति

Shri Sita Stuti

Shri Sita Stuti, श्री सीता स्तुति :- इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचन्द्रजी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जायगी। हे जगज्जननी जानकीजी ! यदि इस दास की आपने इस प्रकार वचनों से ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामी की गुणावली गाकर भव-सागर से तर जायगा।

Shri Janki Stuti / श्री जानकी स्तुति

Shri Janki Stuti

Shri Janki Stuti, श्री जानकी स्तुति :- आपका कमल में निवास है, आप ही हाथ में कमल धारण करने वाली तथा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करने वाली लक्ष्मी हैं, चन्द्रमण्डल में भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीतादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ। आप श्रीरघुनन्दन की आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और भगवान् शिव की अर्धाङ्गिनी कल्याणकारिणी सती हैं। श्रीरामचन्द्रजी की परम प्रियतमा जगदम्बा जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ। सर्वांगसुन्दरी सीताजी का मैं अपने हृदय में निरन्तर चिन्तन करता हूँ।

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