Bala Tripura Sundari Stotram /बाला त्रिपुर सुन्दरी स्तोत्र

Bala Tripura Sundari Stotram
बाला त्रिपुर सुन्दरी स्तोत्रम्

Bala Tripura Sundari Stotram, बाला त्रिपुर सुन्दरी स्तोत्रम् :- जो श्यामवर्ण के विग्रह वाली हैं, जो श्याम मेघ की आभा के समान परम सुन्दर लगती हैं, जो नीले वर्ण के घुँघराले केशों से अलंकृत हैं, बिम्बाफल के समान जिनके ओष्ठ हैं, बलिशत्रु इन्द्र जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, जो करोड़ों बालसूर्य की प्रभा से सम्पन्न हैं, भय से रक्षा के लिये जो कृपाण तथा मुण्ड धारण किये रहती हैं, जो भक्तों को वर प्रदान करने-हेतु सदा तत्पर रहती हैं, उन संकटनाशिनी साक्षात् कालिका स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

श्रीकाली बगलामुखी च ललिता धूम्रावती भैरवी
मातङ्गी भुवनेश्वरी च कमला श्रीवज्रवैरोचनी ।

तारा पूर्वमहापदेन कथिता विद्या स्वयं शम्भुना
लीलारूपमयी च देशदशधा बाला तु मां पातु सा ।। 1 ।।

अर्थात् :- प्रारम्भ से ही सर्वोत्कृष्ट पद धारण करने वाले स्वयं भगवान् शिव के द्वारा श्रीकाली, बगलामुखी, ललिता, धूम्रावती, भैरवी, मातंगी, भुवनेश्वरी, कमला, श्रीवज्रवैरोचनी तथा तारा- इन दस प्रकार के अपने ही अंशों के रूप में कही गयी लीलारूपमयी वे दस महाविद्या स्वरूपिणी भगवती बाला मेरी रक्षा करें।

श्यामां श्यामघनावभासरुचिरां नीलालकालङ्कृतां
बिम्बोष्ठीं बलिशत्रुवन्दितपदां बालार्ककोटिप्रभाम् ।

त्रासत्राणकृपाणमुण्डदधतीं भक्ताय दानोद्यतां
वन्दे संकटनाशिनीं भगवतीं बालां स्वयं कालिकाम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो श्यामवर्ण के विग्रह वाली हैं, जो श्याम मेघ की आभा के समान परम सुन्दर लगती हैं, जो नीले वर्ण के घुँघराले केशों से अलंकृत हैं, बिम्बाफल के समान जिनके ओष्ठ हैं, बलिशत्रु इन्द्र जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, जो करोड़ों बालसूर्य की प्रभा से सम्पन्न हैं, भय से रक्षा के लिये जो कृपाण तथा मुण्ड धारण किये रहती हैं, जो भक्तों को वर प्रदान करने-हेतु सदा तत्पर रहती हैं, उन संकटनाशिनी साक्षात् कालिका स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

इसे भी पढ़ें :- अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

ब्रह्मस्त्रां सुमुखीं बकारविभवां बालां बलाकीनिभां
हस्तन्यस्तसमस्तवैरिरसनामन्ये दधानां गदाम् ।

पीतां भूषणगन्धमाल्यरुचिरां पीताम्बराङ्गां वरां
वन्दे संकटनाशिनीं भगवतीं बालां च बगलामुखीम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- ब्रह्मास्त्र धारण करने वाली, सुन्दर मुख मण्डल वाली, बकार बीज वैभव से सम्पन्न, बलाकी के सदृश धवल स्वरूप वाली, एक हाथ से समस्त शत्रुओं की जिह्वाओं को पकड़े रहने वाली तथा दूसरे हाथ में गदा धारण किये रहने वाली, पीले वर्ण के आभूषण-गन्ध तथा माला धारण करने से परम सुन्दर प्रतीत होने वाली, पीताम्बर से सुशोभित अंगों वाली तथा उत्तम चरित्र वाली उन संकटनाशिनी बगलामुखी स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

बालार्कश्रुतिभास्करां त्रिनयनां मन्दस्मितां सन्मुखीं
वामे पाशधनुर्धरां सुविभवां बाणं तथा दक्षिणे ।

पारावारविहारिणीं परमयीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे सङ्कटनाशिनीं भगवतीं बालां स्वयं षोडशीम् ।। 4 ।।

अर्थात् :- कानों में बाल-सूर्य के समान प्रदीप्त आभूषण धारण करने से जाज्वल्यमान प्रतीत होने वाली, तीन नेत्रों से सुशोभित, मन्द मुस्कान वाली, सुन्दर मुख मण्डल वाली, बायें हाथों में पाश तथा धनुष और दाहिने हाथों में बाण धारण करने वाली, परम ऐश्वर्य सम्पन्न, सुधा सिन्धु  विहार करने वाली, पराशक्ति स्वरूपिणी तथा कमल के आसन पर विराजमान उन संकटनाशिनी साक्षात् षोडशी स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

इसे भी पढ़ें :- श्री दुर्गा सप्तशती

दीर्घां दीर्घकुचामुदग्रदशनां दुष्टच्छिदां देवतां
क्रव्यादां कुटिलेक्षणां च कुटिलां काकध्वजां क्षुत्कृशाम् ।

देवीं सूर्पकरां मलीनवसनां तां पिप्पलादार्चितां
बालां सङ्कटनाशिनीं भगवतीं ध्यायामि धूमावतीम् ।। 5 ।।

अर्थात् :- दीर्घ विग्रह वाली, विशाल पयोधरों से सम्पन्न, उभरी हुई दंतपंक्ति से युक्त, दुष्टों का संहार करने वाली, देवता स्वरूपिणी, मांस का आहार करने वाली, कुटिल नेत्रोंवाली, कुटिल स्वभाव वाली, काक-ध्वजा से सुशोभित [रथ पर विराजमान], भूख के कारण दुर्बल विग्रह वाली, देवी स्वरूपा, हाथ में सूप धारण करने वाली, मलिन वस्त्र धारण करने वाली तथा पिप्पलाद ऋषि से पूजित उन संकटनाशिनी धूमावती स्वरूपिणी भगवती बाला का मैं ध्यान करता हूँ।

उद्यत्कोटिदिवाकरप्रतिभटां बालार्कभाकर्पटां
मालापुस्तकपाशमङ्कुशधरां दैत्येन्द्रमुण्डस्त्रजाम् ।

पीनोत्तुङ्गपयोधरां त्रिनयनां ब्रह्मादिभिः संस्तुतां
बालां सङ्कटनाशिनीं भगवतीं श्रीभैरवीं धीमहि ।। 6 ।।

अर्थात् :- उगते हुए करोड़ों सूर्यों की कान्ति को तिरस्कृत करने वाली, बालसूर्य की प्रभा के समान अरुण वस्त्र धारण करने वाली, अपने हाथों में माला-पुस्तक-पाश और अंकुश धारण करने वाली, दैत्यराज के मुण्ड की माला धारण करने वाली, विशाल तथा उन्नत पयोधरों वाली, तीन नेत्रों वाली तथा ब्रह्मा आदि देवताओं से सम्यक् स्तुत होने वाली उन संकटनाशिनी धूमावती स्वरूपिणी भगवती बाला का मैं ध्यान करता हूँ।

इसे भी पढ़ें :- अथ अर्गला स्तोत्रम्

वीणावादनतत्परां त्रिनयनां मन्दस्मितां सन्मुखीं
वामे पाशधनुर्धरां तु निकरे बाणं तथा दक्षिणे ।

पारावारविहारिणीं परमयीं ब्रह्मासने संस्थितां
वन्दे संकटनाशिनीं भगवतीं मातङ्गिनीं बालिकाम् ।। 7 ।।

अर्थात् :- वीणा बजाने में तल्लीन, तीन नेत्रों से सुशोभित, मन्द मुसकान से युक्त, सामने की ओर मुख करके विराजमान, बायें हाथों में पाश तथा धनुष और दाहिने हाथों में बाण धारण करने वाली, चैतन्य सागर में विहार करने वाली तथा ब्रह्मासन पर विराजने वाली परमयी उन संकटनाशिनी मातंगिनी स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

उद्यत्सूर्यनिभां च इन्दुमुकुटामिन्दीवरे संस्थितां
हस्ते चारुवराभयं च दधतीं पाशं तथा चाङ्कुशम् ।

चित्रालङ्कृतमस्तकां त्रिनयनां ब्रह्मादिभिः सेवितां
वन्दे सङ्कटनाशिनीं च भुवनेशीमादिबालां भजे ।। 8 ।।

अर्थात् :- उगते हुए सूर्य के सदृश प्रभावशाली, चन्द्र-मुकुट से शोभा पानेवाली, रक्तकमल के आसन पर विराजमान, हाथों में सुन्दर वर तथा अभय मुद्रा और पाश तथा अंकुश धारण करने वाली, चित्रों से अलंकृत मस्तक वाली, तीन नेत्रों वाली, ब्रह्मा आदि देवताओं से सुसेवित उन संकटनाशिनी भुवनेशी स्वरूपिणी भगवती आदिबालाका मैं भजन करता हूँ।

इसे भी पढ़ें :- अथ देव्याः कवचम्

देवीं काञ्चनसंनिभां त्रिनयनां फुल्लारविन्दस्थितां
बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरीटोज्ज्वलाम् ।

प्रालेयाचलसंनिभैश्च करिभिराषिञ्चयमानां सदा
बालां सङ्कटनाशिनीं भगवतीं लक्ष्मीं भजे चेन्दिराम् ।। 9 ।।

अर्थात् :- सुवर्ण के समान जिनकी कान्ति है, जो तीन नेत्रों से सुशोभित हो रही हैं, जो विकसित कमल के आसन पर स्थित हैं, जिन्होंने अपने हाथों में वर-अभय तथा कामलद्वय धारण कर रखा है, मस्तक पर किरीट धारण करने से जो प्रकाशमान हैं तथा हिमालय के सदृश [चार श्वेतवर्ण के] हाथियों के द्वारा [अपनी शुण्डों से उठाये गये स्वर्ण-कलशों से] जो निरन्तर अभिषिक्त हो रही हैं, उन संकटनाशिनी इन्दिरा संज्ञक लक्ष्मी स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

सच्छिन्नां स्वशिरोविकीर्णकुटिलां वामे करे बिभ्रतीं
तृप्यास्यस्वशरीरजैश्च रुधिरैः सन्तर्पयन्तीं सखीम् ।

सद्भक्ताय वरप्रदाननिरतां प्रेतासनाध्यासिनीं
बालां सङ्कटनाशिनीं भगवतीं श्रीछिन्नमस्तां भजे ।। 10 ।।

अर्थात् :- पूर्णरूप से कटे मस्तक वाली, अपने कटे सिर के कारण कुटिल प्रतीत होनेवाली, कटे सिर को अपने बायें हाथ में धारण करने वाली, तृप्त मुखमण्डल वाली, अपने शरीर से निकले रक्त से अपनी सखी को संतृप्त करने वाली, सद्भक्तों को वरदान देने में तत्पर रहने वाली और प्रेतासन पर विराजमान रहने वाली उन संकटनाशिनी छिन्नमस्ता स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

इसे भी पढ़ें :- दुर्गा सप्तशती पाठ विधिः

उग्रामेकजटामनन्तसुखदां दूर्वादलाभामजां
कर्त्रीखड्गकपालनीलकमलान् हस्तैर्वहन्तीं शिवाम् ।

कण्ठे मुण्डस्रजां करालवदनां कञ्जासने संस्थितां
वन्दे सङ्कटनाशिनीं भगवतीं बालां स्वयं तारिणीम् ।। 11 ।।

अर्थात् :- जो अत्यन्त उग्र स्वभाव वाली हैं, जो एक जटावाली हैं, जो परम सुखदायिनी हैं, दूर्वादल की आभा के समान जिनका वर्ण है, जो जन्मरहित हैं, जिन्होंने अपने हाथों में कैंची-खड्ग-कपाल और नीलकमल धारण कर रखा है, जो कल्याणमयी हैं, जिनके गले में मुण्डमाला सुशोभित हो रही है, जिनका मुखमण्डल भयंकर है तथा जो कमल के आसन पर विराजमान है, उन संकटनाशिनी साक्षात् तारा स्वरूपिणी भगवती बाला की मैं वन्दना करता हूँ।

मुखे श्रीमातङ्गी तदनुकिलतारा च नयने
तदन्तरगा काली भृकुटिसदने भैरवि परा ।

कटौ छिन्ना धूमावती जय कूचेन्दौ कमलजा
पदांशे ब्रह्मास्त्रा जयति किल बाला दशमयी ।। 12 ।।

अर्थात् :- जिनके मुख में श्रीमातंगी, उसके बाद नेत्र में भगवती तारा, उसके भीतर स्थित रहने वाली काली, भृकुटि देश में पराम्बा भैरवी, कटि-प्रदेश में छिन्नमस्ता और धूमावती, चन्द्रसदृश आभा वाले वक्षदेश में भगवती कमला और पदभाग में भगवती ब्रह्मास्त्रा विराजमान हैं; ऐसी उन दशविद्या स्वरूपिणी भगवती बाला की बार-बार जय हो।

विराजन् मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी
परित्रासत्राणास्फटिकगुटिकापुस्तकवरा ।

गले रेखास्तिस्त्रो गमकगतिगीतैकनिपुणा
सदा पीता हाला जयति किल बाला दशमयी ।। 13 ।।

अर्थात् :- जिनका वक्षःस्थल मन्दारवृक्ष के पुष्पों के हार से सुशोभित हो रहा है; जो अपने हाथों में महान् भय से रक्षा करने वाली अभय मुद्रा, स्फटिक की गुटिका, पुस्तक तथा वर मुद्रा धारण किये हुई हैं, जिनके गले में तीन रेखाएँ सुशोभित हैं, जो गमक-गति से युक्त गीत गाने में परम निपुणा हैं और सदा मधुपान में निरत रहती हैं; उन दशविद्या स्वरूपिणी भगवती बाला की जय हो।

।। इस प्रकार श्रीमेरुतन्त्र में दशमयीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

इसे भी पढ़ें :- दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्

Leave a Comment

error: Content is protected !!