Shri Geeta Ji Ka Mahatmya / श्री गीता जी का माहात्म्य

Shri Geeta Ji Ka Mahatmya

Shri Geeta Ji Ka Mahatmya, श्री गीता जी का माहात्म्य- यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय, जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे, जो मुझसे द्वेष करता है। जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्धभक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा। और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता हैं।

Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay / भक्ति सहित कर्मयोग

Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay

Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay, भक्ति सहित कर्मयोग का विषय- मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है। सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो। यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे। लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे।

Gyan Nishtha Ka Vishay / ज्ञान निष्ठा का विषय

Gyan Nishtha Ka Vishay

Gyan Nishtha Ka Vishay, ज्ञान निष्ठा का विषय- अपनी बुद्धि से शुद्ध होकर तथा धैर्यपूर्वक मन को वश में करते हुए, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्याग कर, राग और द्वेष से मुक्त होकर जो व्यक्ति एकान्त स्थान में वास करता है, जो थोड़ा खता है, जो अपने शरीर मन तथा वाणी को वश में रखता है, जो सदैव समाधि में रहता है तथा पूर्णतया विरक्त, मिथ्या अहंकार, मिथ्या शक्ति, मिथ्या गर्व, काम, क्रोध तथा भौतिक वस्तुओं के संग्रह से मुक्त है, जो मिथ्या स्वामित्व की भावना से रहित तथा शान्त है वह निश्चय ही आत्म-साक्षात्कार के पद को प्राप्त होता है।

Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay / फल सहित वर्ण धर्म का विषय

Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay

Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay, फल सहित वर्ण धर्म का विषय- हे परन्तप ! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद किया जाता है। शान्तिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता — ये सारे स्वाभाविक गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं। वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, युद्ध में धैर्य, उदारता तथा नेतृत्व — ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।

Teenon Gunon Ke Anusar Gyan / तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान

Teenon Gunon Ke Anusar Gyan

Teenon Gunon Ke Anusar Gyan, Karma, Karta, Buddhi, Dhriti Aur Sukh Ke Prithak Prithak Bhed, तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक्-पृथक् भेद- हे पृथापुत्र ! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य यह जानता है कि क्या करणीय है और क्या नहीं है, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, क्या बाँधने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है। हे भरतश्रेष्ठ !

Sankhya Siddhant Ka Kathan / सांख्य सिद्धान्त का कथन

Sankhya Siddhant Ka Kathan

Karmon Ke Hone Mein Sankhya Siddhant Ka Kathan, कर्मों के होने में सांख्य सिद्धान्त का कथन- हे महाबाहु अर्जुन ! वेदान्त के अनुसार समस्त कर्म की पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं। अब तुम इन्हें मुझसे सुनो। कर्म का स्थान ( शरीर ), कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा — ये पाँच कर्म के कारण हैं। मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन पाँच कारणों के फलस्वरूप होता है।

Tyag Ka Vishay / त्याग का विषय

Tyag Ka Vishay

Tyag Ka Vishay, त्याग का विषय- अर्जुन ने कहा — हे महाबाहु ! मैं त्याग का उद्देश्य जानने का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हृषिकेश ! मैं त्यागमय जीवन ( संन्यास आश्रम ) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ। भगवान् ने कहा – भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं।

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya / ॐ तत् सत् के प्रयोग

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya, ॐ तत् सत् के प्रयोग की व्याख्या- सृष्टि के आदिकाल से ॐ तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों सांकेतिक अभिव्यक्तियाँ ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त होती थीं। अतएव योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का शुभारम्भ सदैव ओम् से करते हैं।

Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed / तप और दान के पृथक

Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed

Aahar, Yagya, Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed, आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक पृथक भेद- परमेश्वर, ब्राह्मणों , गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है। सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना — यही वाणी की तपस्या है। तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि — ये मन की तपस्याएँ हैं ।

Shraddha Aur Shastra Viprit / श्रद्धा और शास्त्र विपरीत

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay, श्रद्धा और शास्त्र विपरीत घोर तप करने वालों का विषय- भगवान् ने कहा- देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है — सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी । अब इसके विषय में सुनो। हे भरतपुत्र ! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है।

Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne / शास्त्र विपरीत आचरणों

Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne Aur Shastranukul Aachranon Ke Liye Prerna

Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne Aur Shastranukul Aachranon Ke Liye Prerna, शास्त्र विपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिये प्रेरणा- इस नरक के तीन द्वार हैं — काम, क्रोध तथा लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्हें त्याग दे, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है। हे कुन्तीपुत्र ! जो व्यक्ति इन तीनों नरक-द्वारों से बच पाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार क्रमशः परम गति को प्राप्त होता है।

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