Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup / भगवान् के प्रभाव और स्वरुप

Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup

Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup Ko Na Janne Valon Ki Ninda Aur Janne Valon Ki Mahima, भगवान् के प्रभाव और स्वरुप को न जानने वालों की निन्दा और जानने वालों की महिमा- हे अर्जुन ! श्रीभगवान् होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है, जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है, वह सब कुछ जानता हूँ। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता। हे भरतवंशी ! हे शत्रुविजेता !

Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay / अन्य देवताओं की उपासना

Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay

Any Devtaon Ki Upasna Ka Vishay, अन्य देवताओं की उपासना का विषय- मैं प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा स्वरुप स्थित हूँ। जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ, जिससे वह उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके। ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त है।

Asuri Swabhav Valon Ki Ninda / आसुरी स्वभाव वालों

Asuri Swabhav Valon Ki Ninda

Asuri Swabhav Valon Ki Ninda Aur Bhagwadbhakton Ki Prashansa, आसुरी स्वभाव वालों की निन्दा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा- तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता। प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है। किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं।

Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan / भगवान् की व्यापकता का कथन

Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan

Sampurn Padarthon Mein Karan Rup Se Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan, सम्पूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान् की व्यापकता का कथन- हे कुन्तीपुत्र ! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मंत्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ। मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ। मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ। हे पृथापुत्र ! यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवों का आदि बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरुषों का तेज हूँ।

Vigyan Sahit Gyan Vishay / विज्ञान सहित ज्ञान विषय

Vigyan Sahit Gyan Vishay

Vigyan Sahit Gyan Vishay, विज्ञान सहित ज्ञान विषय- श्रीभगवान् ने कहा — हे पृथापुत्र ! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो। कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार — यह आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना ( अपरा ) प्रकृतियाँ हैं।

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