Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan / स्थिर बुद्धि पुरुष

Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan

Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan Aur Uski Mahima, स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा- श्रीभगवान् ने कहा – हे पार्थ ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्त्पन्न होने वाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में सन्तोष प्राप्त करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है। अतः हे महाबाहु !

Karmyog Ka Vishay / कर्मयोग का विषय

Karmyog Ka Vishay

Karmyog Ka Vishay, कर्मयोग का विषय- इस तरह भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाते हैं और भगवान् के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जो समस्त दुःखों से परे हैं। भक्ति में संलग्न मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे तथा बुरे कार्यों से अपने मुक्त कर लेता है। अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है।

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh / क्षात्रधर्म के अनुसार युद्ध

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh Karne

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh Karne Ki Avashyakta, क्षात्रधर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता- हे कुन्तीपुत्र ! तुम यदि युद्ध में मारे जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे या यदि तुम जीत जाओगे तो पृथ्वी के साम्राज्य का भोग करोगे। अतः ढृढ़ संकल्प करके खड़े होओ और युद्ध करो। तुम सुख या दुःख, हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किये बिना युद्ध के लिए युद्ध करो। ऐसा करने पर तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।

Sankhya Yog Ka Vishay / सांख्य योग का विषय

Sankhya Yog Ka Vishay

Sankhya Yog Ka Vishay, सांख्य योग का विषय- आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता। हे भरतवंशी ! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता। अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है।

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay / अर्जुन की कायरता के विषय

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein Srikrishnarjun Samwad, अर्जुन की कायरता के विषय में श्रीकृष्णार्जुन संवाद- श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन ! तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है, जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है। ऐसे महापुरुषों को जो मेरे गुरु हैं, उन्हें मार कर जीने की अपेक्षा इस संसार में भीख माँग कर खाना अच्छा है।

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