Kaam Ke Nirodh Ka Vishay / काम के निरोध का विषय

Kaam Ke Nirodh Ka Vishay

Kaam Ke Nirodh Ka Vishay, काम के निरोध का विषय- श्रीभगवान् कहा — हे अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। इसलिए हे भारतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करके इस पाप के महान प्रतीक (काम) का दमन करो और ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार के इस विनाशकर्त्ता का वध करो।

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan / अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan Tatha Rag Dwesh Se Rahit Hokar Karma Karne Ke Liye Prerna, अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण तथा राग द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा- विद्वान व्यक्ति चाहिए कि वह सकाम कर्मों में आसक्त अज्ञानी पुरुषों को कर्म करने से रोके नहीं ताकि उनके मन विचलित न हों । अपितु भक्तिभाव से कर्म करते हुए वह उन्हें सभी प्रकार के कार्यों में लगाये ( जिससे कृष्णभावनामृत का क्रमिक विकास हो )।

Gyanwan Aur Bhagwan / ज्ञानवान् और भगवान्

Gyanwan Aur Bhagwan Ke Liye Loksangrharth

Gyanwan Aur Bhagwan Ke Liye Loksangrharth Karmon Ki Avashyakta, ज्ञानवान् और भगवान् के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता- महापुरुष जो जो आचरण करता है, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुसरणीय कार्यों से जो आदर्श प्रस्तुत करता है, सम्पूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है। यदि मैं नियतकर्म न करूँ तो ये सारे लोग नष्ट हो जायँ।

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan / यज्ञादि कर्मों

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan, यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण- सृष्टि के प्रारम्भ में समस्त प्राणियों के स्वामी ( प्रजापति ) ने विष्णु के लिए यज्ञ सहित मनुष्यों तथा देवताओं की सन्ततियों को रचा और उनसे कहा, ”तुम इस यज्ञ से सुखी रहो क्योंकि इसके करने से तुम्हे सुखपूर्वक रहने तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए समस्त वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो सकेंगी। हे प्रिय अर्जुन !

Gyanyog Aur Karmyog / ज्ञानयोग और कर्मयोग

Gyanyog Aur Karmyog

Gyanyog Aur Karmyog Ke Anusar Anasakt Bhav Se Niyat Karma Karne Ki Shreshthta Ka Nirupan, ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरुपण- श्रीभगवान् ने कहा — हे निष्पाप अर्जुन ! मैं पहले ही बता चुका हूँ  कि आत्म-साक्षात्कार का प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते हैं। कुछ इसे ज्ञानयोग द्वारा समझने का प्रयत्न करते हैं, तो कुछ भक्ति-मय सेवा के द्वारा।

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