Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan / भक्ति सहित ध्यान योग

Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan

Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan, भक्ति सहित ध्यान योग का वर्णन- समस्त इन्द्रियविषयों को बाहर करके, दृष्टि को भौहों के मध्य में केंद्रित करके, प्राण तथा अपान वायु के नथुनों के भीतर रोककर और इस तरह मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके, जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है, वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है।

Gyan Yog Ka Vishay / ज्ञान योग का विषय

Gyan Yog Ka Vishay

Gyan Yog Ka Vishay, ज्ञान योग का विषय- विनम्र साधुपुरुष अपने वास्तविक ज्ञान के कारण एक विद्वान् तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल को समान दृष्टि ( समभाव ) से देखते हैं। जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बंधनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं।

Sankhya Yogi Aur Karmayogi / सांख्य योगी और कर्मयोगी

Sankhya Yogi Aur Karmayogi Ke Lakshan

Sankhya Yogi Aur Karmayogi Ke Lakshan Aur Unki Mahima, सांख्य योगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा- दिव्य भावनामृत युक्त पुरुष देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, चलते-फिरते, सोते तथा श्वास लेते हुए भी अपने अन्तर में सदैव यही जानता रहता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं करता। बोलते, त्यागते, ग्रहण करते या आँखें खोलते-बन्द करते हुए भी वह यह जानता रहता है कि भौतिक इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त हैं और वह इन सबसे पृथक् है।

Sankhya Yog Aur Karmyog Ka Nirnay / सांख्य योग और कर्मयोग

Sankhya Yog Aur Karmyog Ka Nirnay

Sankhya Yog Aur Karmyog Ka Nirnay, सांख्य योग और कर्मयोग का निर्णय- श्रीभगवान् ने उत्तर दिया — मुक्ति के लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय-कर्म ( कर्मयोग ) दोनों ही उत्तम हैं। किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ है। जो पुरुष न तो कर्मफलों से घृणा करता है और न कर्मफल की इच्छा करता है, वह नित्य संन्यासी जाना जाता है। हे महाबाहु अर्जुन ! ऐसा मनुष्य समस्त द्वन्द्वों से रहित होकर भवबन्धन को पार कर पूर्णतया मुक्त हो जाता है।

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