Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima / निष्काम भगवत् भक्ति

Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima

Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima, निष्काम भगवत् भक्ति की महिमा- हे कुन्तीपुत्र ! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो। इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे। इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे।

Sakam Aur Nishkam Upasana Ka Fal / सकाम और निष्काम उपासना

Sakam Aur Nishkam Upasana Ka Fal

Sakam Aur Nishkam Upasana Ka Fal, सकाम और निष्काम उपासना का फल- हे कुन्तीपुत्र ! जो लोग अन्य देवताओं के भक्त हैं और उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, वास्तव में वे मेरी ही पूजा करते हैं, किन्तु वे यह त्रुटिपूर्ण ढंग से करते हैं करते हैं। मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी हूँ। अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वभाव को नहीं पहचान पाते, वे नीचे गिर जाते हैं।

Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan / भगवान् के स्वरुप का वर्णन

Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan

Sarvatmrup Se Prabhav Sahit Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan, सर्वात्मरूप से प्रभाव सहित भगवान् के स्वरुप का वर्णन- मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ। मैं ज्ञेय ( जानने योग्य ), शुध्दिकर्ता तथा ओंकार हूँ। मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ। मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्त प्रिय मित्र हूँ। मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ। हे अर्जुन !

Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale / भगवान् का तिरस्कार

Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale

Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale Aasuri Prakriti Valon Ki Ninda Aur Daivi Prakriti Valon Ke Bhagvadbhajana Ka Prakar, भगवान् का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निन्दा और दैवी प्रकृति वालों के भगवद्भजन का प्रकार- हे पार्थ ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं।

Jagat Ki Utpatti Ka Vishay / जगत् की उत्पत्ति का विषय

Jagat Ki Utpatti Ka Vishay

Jagat Ki Utpatti Ka Vishay, जगत् की उत्पत्ति का विषय- हे कुन्तीपुत्र ! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ। सम्पूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है। यह मेरी इच्छा से बारम्बार स्वतः प्रकट होता रहता है और मेरी इच्छा से अन्त में विनष्ट होता है। हे धनञ्जय ! ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं। मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों में सदैव विरक्त रहता हूँ।

Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay / प्रभाव सहित ज्ञान का विषय

Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay

Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay, प्रभाव सहित ज्ञान का विषय- श्रीभगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊँगा, जिसे जानकर संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे। यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अतः यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है और अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।

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