Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay /पुरुषोत्तम का विषय

Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay

Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay, क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का विषय- जीव दो प्रकार के हैं — च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत् में प्रत्येक जीव च्युत ( क्षर ) होता है और आध्यात्मिक जगत् में प्रत्येक जीव अच्युत ( अक्षर ) कहलाता है। इन दोनों के अतिरिक्त, एक परम पुरुष परमात्मा है, जो साक्षात् अविनाशी भगवान् है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है। चूँकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों के परे हूँ और चूँकि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, अतएव मैं इस जगत् में तथा वेदों में परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ ।

Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay / परमेश्वर के स्वरुप का विषय

Prabhav Sahit Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay

Prabhav Sahit Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay, प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरुप का विषय- मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं। मैं चन्द्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ। मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि ( वैश्वानर ) हूँ और मैं श्वास-प्रश्वास ( प्राण-वायु ) में रह कर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ। मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है।

Jivatma Ka Vishay / जीवात्मा का विषय

Jivatma Ka Vishay

Jivatma Ka Vishay, जीवात्मा का विषय- इस संसार में जीव अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगन्धि को ले जाता है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर उसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है । मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है ।

Sansar Vriksh Ka Kathan / संसार वृक्ष का कथन

Sansar Vriksh Ka Kathan Aur Bhagwat Prapti Ka Upay

Sansar Vriksh Ka Kathan Aur Bhagwat Prapti Ka Upay, संसार वृक्ष का कथन और भगवत प्राप्ति का उपाय- भगवान् ने कहा — कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर तथा पत्तियाँ वैदिक स्त्रोत हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है। इस वृक्ष के वास्तविक स्वरुप का अनुभव इस जगत् में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है या इसका आधार कहाँ है ?

error: Content is protected !!