Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya / ॐ तत् सत् के प्रयोग

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya, ॐ तत् सत् के प्रयोग की व्याख्या- सृष्टि के आदिकाल से ॐ तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों सांकेतिक अभिव्यक्तियाँ ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त होती थीं। अतएव योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का शुभारम्भ सदैव ओम् से करते हैं।

Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed / तप और दान के पृथक

Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed

Aahar, Yagya, Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed, आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक पृथक भेद- परमेश्वर, ब्राह्मणों , गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है। सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना — यही वाणी की तपस्या है। तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि — ये मन की तपस्याएँ हैं ।

Shraddha Aur Shastra Viprit / श्रद्धा और शास्त्र विपरीत

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay, श्रद्धा और शास्त्र विपरीत घोर तप करने वालों का विषय- भगवान् ने कहा- देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है — सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी । अब इसके विषय में सुनो। हे भरतपुत्र ! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है।

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