Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka / भगवान् द्वारा अपनी

Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka

Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka Aur Yog Shakti Ka Kathan, भगवान् द्वारा अपनी विभूतियों का और योगशक्ति का कथन- श्रीभगवान् ने कहा — हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा, क्योंकि हे अर्जुन ! मेरा ऐश्वर्य असीम है। हे अर्जुन ! मुझे समस्त पुरोहितों में मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो। मैं ही समस्त सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ और समस्त जलाशयों में समुद्र हूँ। मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ तथा समस्त जीवों में जीवनीशक्ति (चेतना) हूँ।

Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti / अर्जुन द्वारा भगवान्

Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti

Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti Tatha Vibhuti Aur Yog Shakti, अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति तथा विभूति और योग शक्ति- अर्जुन ने कहा- आप परम भगवान्, परम धाम, परम पवित्र, परम सत्य हैं। आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं। हे जनार्दन !

Fal Aur Prabhav Sahit Bhakti Yog Ka Kathan / फल और प्रभाव

Fal Aur Prabhav Sahit Bhakti Yog Ka Kathan

Fal Aur Prabhav Sahit Bhakti Yog Ka Kathan, फल और प्रभाव सहित भक्ति योग का कथन- मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझ से ही उद्भूत है। जो बुद्धिमान यह भलीभाँति जानते हैं, वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं। मेरे शुद्धभक्तों के विचार मुझमें निवास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परम सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं।

Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti / भगवान् की विभूति

Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti Ka Kathan

Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti Ka Kathan Tatha Unke Janne Ka Fal, भगवान् की विभूति और योग शक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल- श्रीभगवान् ने कहा — हे महाबाहु अर्जुन ! और आगे सुनो। चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताये गए ज्ञान से श्रेष्ठ होगा। न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप ( उद्गम ) हूँ।

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