Bhagwan Dwara Apne Prabhav / भगवान् द्वारा अपने प्रभाव

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Bhagwan Dwara Apne Prabhav Ka Varnan
भगवान् द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन

Bhagwan Dwara Apne Prabhav Ka Varnan Aur Arjun Ko Yuddh Ke Liye Utsahit Karna, भगवान् द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन और अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करना- भगवान् ने कहा — समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ और मैं यहाँ समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ। तुम्हारे ( पाण्डवों के ) सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे। अतः उठो ! लड़ने के लिए तैयार होओ और यश अर्जित करो। 

श्लोक 32 से 34

श्रीभगवानुवाच —
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ।। 32 ।।

श्री-भगवान्-उवाच — भगवान् ने कहा; कालः — काल; अस्मि — हूँ ; लोक — लोकों का; क्षय-कृत् — नाश करने वाला; प्रवृद्धः — महान; लोकान् — समस्त लोगों को; समाहर्तुम् — नष्ट करने में ; इह — इस संसार में ; प्रवृत्तः — लगा हुआ; ऋते — बिना; अपि — भी; त्वाम् — आपको; न — कभी नहीं ; भविष्यन्ति — होंगे; सर्वे — सभी; ये — जो; अवस्थिताः — स्थित; प्रति-अनीकेषु — विपक्ष में ; योधाः — सैनिक।

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ और मैं यहाँ समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ। तुम्हारे ( पाण्डवों के ) सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  2. 9 से 14 — सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन
  3. 15 से 31 — अर्जुन द्वारा भगवान् के विश्वरूप को देखना और स्तुति

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रुन्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ।। 33 ।।

तस्मात् — अतएव; त्वम् — तुम; उत्तिष्ठ — उठो; लभस्व — प्राप्त करो; जित्वा — जीतकर; शत्रून् — शत्रुओं को; भुंक्ष्व — भोग करो; राज्यम् — राज्य का; समृद्धम् — सम्पन्न; मया — मेरे द्वारा; एव — निश्चय ही; एते — ये सब; निहताः — मारे गये; पूर्वम् एव — पहले ही; निमित्त मात्रम् — केवल कारण मात्र; भव — बनो; सव्य-साचिन् — हे सव्यसाची। 

तात्पर्य — अतः उठो ! लड़ने के लिए तैयार होओ और यश अर्जित करो। अपने शत्रुओं को जीतकर सम्पन्न राज्य का भोग करो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं और हे सव्यसाची ! तुम तो युद्ध में केवल निमित्तमात्र हो सकते हो।

 द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि माव्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ।। 34 ।।

द्रोणम् च — तथा द्रोण; भीष्मम् च — भीष्म भी; जयद्रथम् च — तथा जयद्रथ; कर्णम् — कर्ण; तथा — और; अन्यान् — अन्य; अपि — निश्चय ही; योध-वीरान् — महान योद्धा; मया — मेरे द्वारा; हतान् — पहले ही मारे गये; त्वम् — तुम; जहि — मारो; मा — मत; व्यथिष्ठाः — विचलित होओ; युध्यस्व — लड़ो; जेता असि — जीतोगे; रणे — युद्ध में ; सपत्नान् — शत्रुओं का। 

तात्पर्य — द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य महान योद्धा पहले ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। अतः तुम उनका वध करो और तनिक भी विचलित न होओ। तुम केवल युद्ध करो। युद्ध में तुम अपने शत्रुओं को परास्त करोगे।

आगे के श्लोक :–

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