Bhagwan Dwara Apne Vishwaroop Ka Varnan / भगवान् द्वारा

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Bhagwan Dwara Apne Vishwaroop Ka Varnan
भगवान् द्वारा अपने विश्वरूप का वर्णन

Bhagwan Dwara Apne Vishwaroop Ka Varnan, भगवान् द्वारा अपने विश्वरूप का वर्णन- भगवान् ने कहा — हे अर्जुन, हे पार्थ ! अब तुम मेरे ऐश्वर्य को, सैकड़ों-हजारों प्रकार के दैवी तथा विविध रंगों वाले रूपों को देखो। हे भारत ! लो, तुम आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं के विभिन्न रूपों को यहाँ देखो। तुम ऐसे अनेक आश्चर्यमय रूपों को देखो, जिन्हें पहले किसी ने न तो कभी देखा है, न सुना है। हे अर्जुन ! 

श्लोक 5 से 8

श्रीभगवानुवाच —
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ।। 5 ।।

श्री-भगवान्-उवाच — भगवान् ने कहा; पश्य — देखो; मे — मेरा; पार्थ — हे पृथापुत्र; रूपाणि — रूप; शतशः — सैकड़ों ; अथ — भी; सहस्रशः — हजारों ; नाना-विधानि — नाना रूप वाले; दिव्यानि — दिव्य; नाना — नाना प्रकार के; वर्ण — रंग; आकृतीनि — रूप; च — भी। 

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — हे अर्जुन, हे पार्थ ! अब तुम मेरे ऐश्वर्य को, सैकड़ों-हजारों प्रकार के दैवी तथा विविध रंगों वाले रूपों को देखो।

 पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ।। 6 ।।

पश्य — देखो; आदित्यान् — अदिति के बारहों पुत्रों को; वसून् — आठों वसुओं को; रुद्रान् — रूद्र के ग्यारह रूपों को; अश्विनौ — दो अश्विनी कुमारों को; मरुतः — उन्चासों मरुतों को; तथा — भी; बहूनि — अनेक; अदृष्ट — न देखे हुए; पूर्वाणि — पहले, इसके पूर्व; पश्य — देखो; आश्चर्याणि — समस्त आश्चर्यों को; भारत — हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ।

तात्पर्य — हे भारत ! लो, तुम आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं के विभिन्न रूपों को यहाँ देखो। तुम ऐसे अनेक आश्चर्यमय रूपों को देखो, जिन्हें पहले किसी ने न तो कभी देखा है, न सुना है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  3. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ।। 7 ।।

इह — इसमें ; एक-स्थम् — एक स्थान में ; जगत् — ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम् — पूर्णतया; पश्य — देखो; अद्य — तुरन्त; स — सहित; चर — जंगम; अचरम् — तथा अचर, जड़ ; मम — मेरे; देहे — शरीर में ; गुडाकेश — हे अर्जुन; यत् — जो; च — भी; अन्यत् — अन्य, और; द्रष्टुम् — देखना; इच्छसि — चाहते हो।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! तुम जो भी देखना चाहो, उसे तत्क्षण मेरे इस शरीर में देखो। तुम इस समय तथा भविष्य में भी जो भी देखना चाहते हो, उसको यह विश्वरूप दिखाने वाला है। यहाँ एक ही स्थान पर चर-अचर सब कुछ है।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ।। 8 ।।

न — कभी नहीं ; तु — लेकिन; माम् — मुझको; शक्यसे — तुम समर्थ होगे; द्रष्टुम् — देखने में ; अनेन — इन; एव — निश्चय ही; स्व-चक्षुषा — अपनी आँखों से; दिव्यम् — दिव्य; ददामि — देता हूँ ; ते — तुमको; चक्षुः — आँखें ; पश्य — देखो; मे — मेरी; योगम् ऐश्वरम् — अचिन्त्य योगशक्ति। 

तात्पर्य — किन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते। अतः मैं तुम्हें दिव्य आँखें दे रहा हूँ। अब मेरा योग ऐश्वर्य को देखो।

आगे के श्लोक :–

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