Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka / भगवान् द्वारा अपनी

Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka Aur Yog Shakti Ka Kathan
भगवान् द्वारा अपनी विभूतियों का और योग शक्ति का कथन

Bhagwan Dwara Apni Vibhutiyon Ka Aur Yog Shakti Ka Kathan, भगवान् द्वारा अपनी विभूतियों का और योगशक्ति का कथन- श्रीभगवान् ने कहा — हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा, क्योंकि हे अर्जुन ! मेरा ऐश्वर्य असीम है। हे अर्जुन ! मुझे समस्त पुरोहितों में मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो। मैं ही समस्त सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ और समस्त जलाशयों में समुद्र हूँ। मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ तथा समस्त जीवों में जीवनीशक्ति (चेतना) हूँ।

श्लोक 19 से 42

श्रीभगवानुवाच —
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ।। 19 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा; हन्त — हाँ ; ते — तुमसे; कथयिष्यामि — कहूँगा; दिव्याः — दैवी; हि — निश्चय ही; आत्म-विभूतयः — अपने ऐश्वर्यों को; प्राधान्यतः — प्रमुख रूप से; कुरु-श्रेष्ठ — हे कुरुश्रेष्ठ; न अस्ति — नहीं है ; अन्तः — सीमा; विस्तरस्य — विस्तार की; मे — मेरे ।

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा, क्योंकि हे अर्जुन ! मेरा ऐश्वर्य असीम है।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।। 20 ।।

अहम् — मैं ; आत्मा — आत्मा; गुडाकेश — हे अर्जुन; सर्व-भूत — समस्त जीव; आशय-स्थितः — हृदय में स्थित; अहम् — मैं ; आदिः — उद्गम; च — भी; मध्यम् — मध्य; च — भी; भूतानाम् — समस्त जीवों का; अन्तः — अन्त; एव — निश्चय ही; च — तथा।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! मैं समस्त जीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।

आदित्यनामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंश्रुमान्
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ।। 21 ।।

आदित्यानाम् — आदित्यों में ; अहम् — मैं हूँ ; विष्णुः — परमेश्वर; ज्योतिषाम् — समस्त ज्योतियों में ; रविः — सूर्य; अंशु-मान् — किरणमाली, प्रकाशमान; मरीचिः — मरीचि; मरुताम् — मरुतों से; अस्मि — हूँ ; नक्षत्राणाम् — तारों में ; अहम् — मैं हूँ ; शशी — चन्द्रमा।

तात्पर्य — मैं आदित्यों में विष्णु, प्रकाशों में तेजस्वी सूर्य, मरुतों में मरीचि तथा नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।। 22 ।।

वेदानाम् — वेदों में; साम-वेदः — सामवेद; अस्मि — हूँ ; देवानाम् — देवताओं में ; अस्मि — हूँ ; वासवः — स्वर्ग का राजा; इन्द्रियाणाम् — इन्द्रियों में ; मनः — मन; च — भी; अस्मि — हूँ ; भूतानाम् — जीवों में ; अस्मि — हूँ ; चेतना — प्राण, जीवनी शक्ति। 

तात्पर्य — मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ तथा समस्त जीवों में जीवनीशक्ति (चेतना) हूँ।

 रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।। 23 ।।

रुद्राणाम् — समस्त रुद्रों में; शङ्कर — शिवजी; च — भी; अस्मि — हूँ ; वित्त-ईशः — देवताओं का कोषाध्यक्ष; यक्ष-रक्षसाम् — यक्षों तथा राक्षसों में ; वसूनाम् — वसुओं में ; पावकः — अग्नि; च — भी; अस्मि — हूँ ; मेरुः — मेरु; शिखरिणाम् — समस्त पर्वतों में ; अहम् — मैं हूँ।

तात्पर्य — मैं समस्त रुद्रों में शिव हूँ, यक्षों तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता ( कुबेर ) हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतों में मेरु हूँ।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ।। 24 ।।

पुरोधसाम् — समस्त पुरोहितों में ; च — भी; मुख्यम् — प्रमुख; माम् — मुझको; विद्धि — जानो; पार्थ — हे पृथापुत्र; बृहस्पतिम् — बृहस्पति; सेनानीनाम् — समस्त सेनानायकों में से; अहम् — मैं हूँ ; स्कन्दः — कार्तिकेय; सरसाम् — समस्त जलाशयों में ; अस्मि — मैं हूँ ; सागरः — समुद्र।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! मुझे समस्त पुरोहितों में मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो। मैं ही समस्त सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ और समस्त जलाशयों में समुद्र हूँ।

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्ये कमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ।। 25 ।।

महा-ऋषीणाम् — महर्षियों में ; भृगुः — भृगु; अहम् — मैं हूँ ; गिराम् — वाणी में ; अस्मि — हूँ ; एकम् अक्षरम् — प्रणव; यज्ञानाम् — समस्त यज्ञों में ; जप-यज्ञः — कीर्तन, जप; अस्मि — हूँ; स्थावराणाम् — जड़ पदार्थों में ; हिमालयः — हिमालय पर्वत। 

तात्पर्य — मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में दिव्य ओंकार हूँ, समस्त यज्ञों में पवित्र नाम का कीर्तन ( जप ) तथा समस्त अचलों में हिमालय हूँ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  2. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
  3. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  4. अध्याय बारह — भक्तियोग

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ।। 26 ।।

अश्वत्थः — अश्वत्थ वृक्ष; सर्व-वृक्षाणाम् — सारे वृक्षों में ; देव-ऋषीणाम् — समस्त देवर्षियों में ; च — तथा; नारदः — नारद; गन्धर्वाणाम् — गन्धर्वलोक के वासियों में ; चित्ररथः — चित्ररथ; सिद्धानाम् — समस्त सिद्धि प्राप्त हुओं में ; कपिलः मुनिः — कपिल मुनि। 

तात्पर्य — मैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ वृक्ष हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ। मैं गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।

 उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ।। 27 ।।

उच्चैःश्रवसम् — उच्चैःश्रवा; अश्वानाम् — घोड़ों में ; विद्धि — जानो; माम् — मुझको; अमृत-उद्भवम् — समुद्र मन्थन से उत्पन्न; ऐरावतम् — ऐरावत; गज-इंद्राणाम् — मुख्य हाथियों में ; नराणाम् — मनुष्यों में ; च — तथा; नर-अधिपम् — राजा। 

तात्पर्य — घोड़ो में मुझे उच्चैःश्रवा जानो, जो अमृत के लिए समुद्र मन्थन के समय उत्पन्न हुआ था। गजराजों में मैं ऐरावत हूँ तथा मनुष्यों में राजा हूँ।

 आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ।। 28 ।।

आयुधानाम् — हथियारों में ; अहम् — मैं हूँ ; वज्रम् — वज्र; धेनूनाम् — गायों में ; अस्मि — हूँ ; काम-धुक् — सुरभि गाय; प्रजनः — सन्तान, उत्पत्ति का कारण; च — तथा; अस्मि — हूँ ; कन्दर्पः — कामदेव; सर्पाणाम् — सर्पों में ; अस्मि — हूँ ; वासुकिः — वासुकि।

तात्पर्य — मैं हथियारों में व्रज हूँ, गायों में सुरभि, सन्तति उत्पत्ति के कारणों में प्रेम का देवता कामदेव तथा सर्पों में वासुकि हूँ।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ।। 29 ।।

अनन्तः — अनन्त; च — भी; अस्मि — हूँ ; नागनाम् — फणों वाले सर्पों में ; वरुणः — जल के अधिष्ठाता देवता; यादसाम् — समस्त जलचरों में ; अहम् — मैं हूँ ; पितृणाम् — पितरों में ; अर्यमा — अर्यमा; च — भी; अस्मि — हूँ ; यमः — मृत्यु का नियामक; संयमताम् — समस्त नियमनकर्ताओं में ; अहम् — मैं हूँ। 

तात्पर्य — अनेक फणों वाले नागों में मैं अनन्त हूँ और जलचरों में वरुणदेव हूँ। मैं पितरों में अर्यमा हूँ तथा नियमों के निर्वाहकों में मैं मृत्युराज यम हूँ।

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