Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale / भगवान् का तिरस्कार

अध्याय नौ परम गुह्य ज्ञान

Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale Aasuri Prakriti Valon Ki Ninda
भगवान् का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निन्दा

Bhagwan Ka Tiraskar Karne Vale Aasuri Prakriti Valon Ki Ninda Aur Daivi Prakriti Valon Ke Bhagvadbhajana Ka Prakar, भगवान् का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निन्दा और दैवी प्रकृति वालों के भगवद्भजन का प्रकार- हे पार्थ ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं। अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्व रूप में करते हैं।

श्लोक 11 से 15

अवजानन्ति मां मूढा मनुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।। 11 ।।

अवजानन्ति — उपहास करते हैं ; माम् — मुझको; मूढा — मुर्ख व्यक्ति; मानुषीम् — मनुष्य रूप में; तनुम् — शरीर; आश्रितम् — मानते हुए; परम् — दिव्य; भावम् — स्वभाव को; अजानन्तः — न जानते हुए; मम — मेरा; भूत — प्रत्येक वस्तु का; महा-ईश्वरम् — परम स्वामी।

तात्पर्य — जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मुझ परमेश्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते।

मेघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ।। 12 ।।

मोघ-आशाः — निष्फल आशा; मोघ-कर्माणः — निष्फल सकाम कर्म; मोघ-ज्ञानाः — विफल ज्ञान; विचेतसः — मोहग्रस्त; राक्षसीम् — राक्षसी; आसुरीम् — आसुरी; च — तथा; एव — निश्चय ही; प्रकृतिम् — स्वभाव को; मोहिनीम् — मोहने वाली; श्रिताः — शरण ग्रहण किये हुए। 

तात्पर्य — जो लोग इस प्रकार मोहग्रस्त होते हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के प्रति आकृष्ट रहते हैं। इस मोहग्रस्त अवस्था में उनकी मुक्ति-आशा, उनके सकाम कर्म तथा ज्ञान का अनुशीलन सभी निष्फल जाते हैं।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय तीन — कर्मयोग
  2. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान
  3. 7 से 10 — जगत् की उत्पत्ति का विषय

 महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ।। 13 ।।

महा-आत्मानः — महापुरुष; तु — लेकिन; माम् — मुझको; पार्थ — हे पृथापुत्र; दैवीम् — दैवी; प्रकृतिम् — प्रकृति के; आश्रिताः — शरणागत; भजन्ति — सेवा करते हैं; अनन्य-मनसः — अविचलित मन से; ज्ञात्वा — जानकर; भूत — सृष्टि का; आदिम् — उद्गम; अव्ययम् — अविनाशी। 

तात्पर्य — हे पार्थ ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं।

 सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।। 14 ।।

सततम् — निरन्तर; कीर्तयन्तः — कीर्तन करते हुए; माम् — मेरे विषय में; यत्नतः — प्रयास करते हुए; च — भी; दृढ-व्रताः — संकल्पपूर्वक; नमस्यन्तः — नमस्कार करते हुए; च — भी; माम् — मुझको; भक्त्या — भक्ति में; नित्य-युक्ताः — सदैव रत रहकर; उपासते — पूजा करते हैं। 

तात्पर्य — ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए, दृढ़संकल्प के साथ प्रयास करते हुए, मुझे नमस्कार करते हुए, भक्तिभाव से निरन्तर मेरी पूजा करते हैं।

 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 15 ।।

ज्ञान-यज्ञेन — ज्ञान के अनुशीलन द्वारा; च — भी; अपि — निश्चय ही; अन्ये — अन्य लोग; यजन्तः — यज्ञ करते हुए; माम् — मुझको; उपासते — पूजते हैं; एकत्वेन — एकान्त भाव से; पृथक्त्वेन — द्वैतभाव से; बहुधा — अनेक प्रकार से; विश्वतः – मुखम् — विश्व रूप में। 

तात्पर्य — अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्व रूप में करते हैं।

आगे के श्लोक :–

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