Bhagwan Ke Mantra Arth Sahit / भगवान् के मन्त्र अर्थ सहित

Bhagwan Ke Mantra Arth Sahit
भगवान् के मन्त्र अर्थ सहित

Bhagwan Ke Mantra Arth Sahit, भगवान् के मन्त्र अर्थ सहित :- जो कर्पूर जैसे गौर हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान् शिव माता भवानी सहित मेरे हृदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है। सब प्रकार के सुख देने वाले, सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले, शरण लेने वाले, त्रिनेत्र अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान को देखने वाले आप ही शिव की पत्नी हो। आप सभी रूपों से जुड़े हैं, आपको कोटि-कोटि नमस्कार।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि ।।

अर्थात् :- जो कर्पूर जैसे गौर हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान् शिव माता भवानी सहित मेरे हृदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

गजाननं भूत गणादि सेवितं
कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम् ।
उमासुतं शोक विनाशकारकम्
नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम् ।।

अर्थात् :- हे गज (हाथी) के मुख वाले, भूत गणों के द्वारा सेवा किए जाने वाले, आप कपिथा जाम्बू को ग्रहण करने वाले, जो उमा के पुत्र हैं। आप समस्त दुःखों को समाप्त करते हैं। मैं विघ्न को दूर करने वाले श्रीगणेश जी को, जिनके चरण कमल के समान है, उनको नमन करता हूँ।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं ।।

अर्थात् :- हे भगवान् ! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

अर्थात् :- देवी शक्ति के रूप में सभी प्राणियों में विराजमान है उन देवी को मेरा नमस्कार, नमस्कार, कोटि-कोटि नमस्कार।

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते ।।

अर्थात् :- सब प्रकार के सुख देने वाले, सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले, शरण लेने वाले, त्रिनेत्र अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान को देखने वाले आप ही शिव की पत्नी हो। आप सभी रूपों से जुड़े हैं, आपको कोटि-कोटि नमस्कार।

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।

अर्थात् :- हे माँ जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा आपको कोटि-कोटि नमस्कार है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

अर्थात् :- जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है, विनाश का कार्य होता है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर आता हूँ और इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे ।।

अर्थात् :- सज्जनों और साधुओं की रक्षा करने के लिए और पृथ्वी पर पाप को नष्ट करने के लिए तथा दुर्जनों और पापियों के विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में बार-बार अवतार लेता हूँ और समस्त पृथ्वी वासियों का कल्याण करता हूँ।

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।

अर्थात् :- हम भगवान् शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत् का पालन-पोषण करते हैं।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

अर्थात् :- हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय है, जो ज्ञान का भंडार है, जो पापों तथा अज्ञान को दूर करने वाला है, वह हमें प्रकाश दिखाए और हमें सत्य पथ पर ले जाए।

ॐ आदित्यस्य नमस्कारम् ये कुर्वन्तु दिने दिने
आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते ।।

अर्थात् :- जो लोग प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते हैं उनकी आयु, प्रज्ञा, बल, वीर्य और तेज बढ़ता है।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

इसे भी पढ़ें :-

Leave a Comment

error: Content is protected !!