Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup / भगवान् के प्रभाव और स्वरुप

Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup Ko Na Janne Valon Ki Ninda
भगवान् के प्रभाव और स्वरुप को न जानने वालों की निन्दा

Bhagwan Ke Prabhav Aur Swarup Ko Na Janne Valon Ki Ninda Aur Janne Valon Ki Mahima, भगवान् के प्रभाव और स्वरुप को न जानने वालों की निन्दा और जानने वालों की महिमा- हे अर्जुन ! श्रीभगवान् होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है, जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है, वह सब कुछ जानता हूँ। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता। हे भरतवंशी ! हे शत्रुविजेता !

श्लोक 24 से 30

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।। 24 ।।

अव्यक्तम् — अप्रकट; व्यक्तिम् — स्वरुप को; आपन्नम् — प्राप्त हुआ; मन्यन्ते — सोचते हैं; माम् — मुझको; अबुद्धयः — अल्पज्ञानी व्यक्ति; परम् — परम; भावम् — सत्ता; अजनान्तः — बिना जाने; मम — मेरा; अव्ययम् — अनश्वर; अनुत्तमम् — सर्वश्रेष्ठ।

तात्पर्य — बुद्धिहीन मनुष्य मुझको ठीक से न जानने के कारण सोचते हैं कि मैं ( भगवान् कृष्ण ) पहले निराकार था और अब मैंने इस स्वरुप को धारण किया है। वे अपने अल्पज्ञान के कारण मेरी अविनाशी तथा सर्वोच्च प्रकृति को नहीं जान पाते।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।। 25 ।।

न — न तो; अहम् — मैं; प्रकाशः — प्रकट; सर्वस्य — सबों के लिए; योग-माया — अन्तरंगा शक्ति से; समावृतः — आच्छादित; मूढः — मूर्ख; अयम् — यह; न — नहीं; अभिजानाति समझ सकता है; लोकः — लोग; माम् — मुझको; अजम् — अजन्मा को; अव्ययम् — अविनाशी को।

तात्पर्य — मैं मूर्खों तथा अल्पज्ञों के लिए कभी प्रकट नहीं हूँ। उनके लिए तो मैं अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा आच्छादित रहता हूँ, अतः वे यह नहीं जान पाते कि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ।

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।। 26 ।।

वेद — जानता हूँ; अहम् — मैं; समतीतानि — भूतकाल को; वर्तमानानि — वर्तमान को; च — तथा; अर्जुन — हे अर्जुन; भविष्याणि — भविष्य को; च — भी; भूतानि — सारे जीवों को; माम् — मुझको; तु — लेकिन; वेद — जानता है; न — नहीं; कश्चन — कोई। 

तात्पर्य — हे अर्जुन ! श्रीभगवान् होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है, जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है, वह सब कुछ जानता हूँ। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

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  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  3. 8 से 12 — भगवान् की व्यापकता का कथन
  4. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति

 इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्दमोहेन भारत
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ।। 27 ।।

इच्छा — इच्छा; द्वेष — तथा घृणा; समुत्थेन — उदय होने से; द्वन्द्व — द्वन्द्व से; मोहेन — मोह के द्वारा; भारत — हे भरतवंशी; सर्व — सभी; भूतानि — जीव; सम्मोहम् — मोह को; सर्गे — जन्म लेकर; यान्ति — जाते हैं, प्राप्त होते हैं; परन्तप — हे शत्रुओं के विजेता।

तात्पर्य — हे भरतवंशी ! हे शत्रुविजेता ! समस्त जीव जन्म लेकर इच्छा तथा घृणा से उत्त्पन्न द्वन्द्वों से मोहग्रस्त होकर मोह को प्राप्त होते हैं।

येषां तवन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढ़व्रताः ।। 28 ।।

येषाम् — जिन; तु — लेकिन; अन्त-गतम् — पूर्णतया विनष्ट; पापम् — पाप; जनानाम् — मनुष्यों का; पुण्य — पवित्र; कर्मणाम् — जिनके पूर्व कर्म; ते — वे; द्वन्द्व — द्वैत के; मोह — मोह से; निर्मुक्ता — मुक्त; भजन्ते — भक्ति में तत्पर होते हैं; माम् — मुझको; दृढ-व्रताः — संकल्पपूर्वक। 

तात्पर्य — जिन मनुष्यों ने पर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चूका होता है, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं और वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं।

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