Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan / भगवान् के स्वरुप का वर्णन

अध्याय नौ परम गुह्य ज्ञान

Sarvatmrup Se Prabhav Sahit Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan
सर्वात्मरूप से प्रभाव सहित भगवान् के स्वरुप का वर्णन

Sarvatmrup Se Prabhav Sahit Bhagwan Ke Swaroop Ka Varnan, सर्वात्मरूप से प्रभाव सहित भगवान् के स्वरुप का वर्णन- मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ। मैं ज्ञेय ( जानने योग्य ), शुध्दिकर्ता तथा ओंकार हूँ। मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ। मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्त प्रिय मित्र हूँ। मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ। हे अर्जुन ! 

श्लोक 16 से 19

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ।। 16 ।।

अहम् — मैं ; क्रतुः — वैदिक अनुष्ठान, कर्मकाण्ड; अहम् — मैं ; यज्ञः — स्मार्त यज्ञ; स्वधा — तर्पण; अहम् — मैं; औषधम् — जड़ीबूटी; मन्त्रः — दिव्य ध्वनि; अहम् — मैं ; अहम् — मैं ; एव — निश्चय ही; आज्यम् — घृत; अहम् — मैं ; अग्निः — अग्नि; अहम् — मैं ; हुतम् — आहुति, भेंट।

तात्पर्य — किन्तु मैं ही कर्मकाण्ड, मैं ही यज्ञ, पितरों को दिया जाने वाला तर्पण, औषधि, दिव्य ध्वनि ( मन्त्र ), घी, अग्नि तथा आहुति हूँ।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः
वेद्यं पवित्रम् ॐकार ऋक् साम यजुरेव च ।। 17 ।। 

पिता — पिता; अहम् — मैं ; अस्य — इस; जगतः — ब्रह्माण्ड का; माता — माता; धाता — आश्रयदाता; पितामहः — बाबा; वे -द्यम् — जानने योग्य; पवित्रम् — शुद्ध करने वाला; ॐकार — ॐ अक्षर; ऋक् — ऋग्वेद; साम — सामवेद; यजुः — यजुर्वेद; एव — निश्चय ही; च — तथा।

तात्पर्य — मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ। मैं ज्ञेय ( जानने योग्य ), शुध्दिकर्ता तथा ओंकार हूँ। मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  2. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान
  3. 1 से 6 — प्रभाव सहित ज्ञान का विषय
  4. 7 से 10 — जगत् की उत्पत्ति का विषय

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ।। 18 ।।

गतिः — लक्ष्य; भर्ता — पालक; प्रभुः — भगवान्; साक्षी — गवाह; निवासः — धाम; शरणम् — शरण; सु-हृत् — घनिष्ट मित्र; प्रभवः — सृष्टि; प्रलयः — संहार; स्थानम् — भूमि, स्थिति; निधानम् — आश्रय, विश्राम स्थल; बीजम् — बीज, कारण; अव्ययम् — अविनाशी।

तात्पर्य — मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्त प्रिय मित्र हूँ। मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ।

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ।। 19 ।।

तपामि — ताप देता हूँ, गर्मी पहुँचता हूँ ; अहम् — मैं ; अहम् — मैं ; वर्षम् — वर्षा; निगृह्णामि — रोके रहता हूँ ; उत्सृजामि — भेजता हूँ ; च — तथा; अमृतम् — अमरत्व; च — तथा; अहम् — मैं ; अर्जुन — हे अर्जुन।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! मैं ही ताप प्रदान करता हूँ और वर्षा को रोकता तथा लाता हूँ। मैं अमरत्व हूँ और साक्षात् मृत्यु भी हूँ। आत्मा तथा पदार्थ ( सत् तथा असत् ) दोनों मुझ में हैं।

आगे के श्लोक :–

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