Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti / भगवान् की विभूति

अध्याय दस श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti Ka Kathan
भगवान् की विभूति और योग शक्ति का कथन

Bhagwan Ki Vibhuti Aur Yog Shakti Ka Kathan Tatha Unke Janne Ka Fal, भगवान् की विभूति और योग शक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल- श्रीभगवान् ने कहा — हे महाबाहु अर्जुन ! और आगे सुनो। चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताये गए ज्ञान से श्रेष्ठ होगा। न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप ( उद्गम ) हूँ। 

श्लोक 1 से 7

श्रीभगवानुवाच —
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।

यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ।। 1 ।।

श्री-भगवान्-उवाच — भगवान् ने कहा; भूयः — फिर; एव — निश्चय ही; महा-बाहो — हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; शृणु — सुनो; मे — मेरा; परमम् — परम; वचः — उपदेश; यत् — जो; ते — तुमको; अहम् — मैं; प्रीयमाणाय — अपना प्रिय मानकर; वक्ष्यामि — कहता हूँ ; हित-काम्यया — तुम्हारे हित ( लाभ ) के लिए।

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — हे महाबाहु अर्जुन ! और आगे सुनो। चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताये गए ज्ञान से श्रेष्ठ होगा।

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ।। 2 ।।

न — कभी नहीं; में — मेरे; विदुः — जानते हैं ; सुर-गणाः — देवता; प्रभवम् — उत्पत्ति या ऐश्वर्य को; न — कभी नहीं; महा-ऋषयः — बड़े-बड़े ऋषि; अहम् — मैं हूँ ; आदिः — उत्पत्ति; हि — निश्चय ही; देवानाम् — देवताओं का; महा-ऋषीणाम् — महर्षियों का; च — भी; सर्वशः — सभी तरह से।

तात्पर्य — न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप ( उद्गम ) हूँ।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। 3 ।।

यः — जो; माम् — मुझको; अजम् — अजन्मा; अनादिम् — आदिरहित; च — भी; वेत्ति — जानता है; लोक — लोकों का; महा-ईश्वरम् — परम स्वामी; असम्मूढः — मोहरहित; सः — वह; मर्त्येषु — मरणशील लोगों में ; सर्व-पापैः — सारे पापकर्मों से; प्रमुच्यते — मुक्त हो जाता है।

तात्पर्य — जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त लोकों के स्वामी के रूप में जानता है, मनुष्यों में केवल वही मोहरहित और समस्त पापों से मुक्त होता है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  2. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान
  3. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
  4. अध्याय ग्यारह — विराट रूप

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ।। 4 ।।

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ।। 5 ।।

बुद्धिः — बुद्धि; ज्ञानम् — ज्ञान; असम्मोहः — संशय से रहित; क्षमा — क्षमा; सत्यम् — सत्यता; दमः — इन्द्रियनिग्रह; शमः — मन का निग्रह; सुखम् — सुख; दुःखम् — दुःख; भवः — जन्म; अभावः — मृत्यु; भयम् — डर; च — भी; अभयम् — निर्भीकता; एव — भी; च — तथा; अहिंसा — अहिंसा; समता — समभाव; तुष्टिः — सन्तोष; तपः — तपस्या; दानम् — दान; यशः — यश; अयशः — अपयश, अपकीर्ति; भवन्ति — होते हैं ; भावाः — प्रकृतियाँ ; भूतानाम् — जीवों की; मत्तः — मुझसे; एव — निश्चय ही; पृथक्-विधाः — भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यवस्थित।

तात्पर्य — बुद्धि, ज्ञान, संशय तथा मोह से मुक्ति, क्षमाभाव, सत्यता, इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह, सुख तथा दुःख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश तथा अपयश — जीवों के ये विविध गुण मेरे ही द्वारा उत्पन्न हैं।

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ।। 6 ।।

महा-ऋषयः — महर्षिगण; सप्त — सात; पूर्वे — पूर्वकाल में; चत्वारः — चार; मनवः — मनुगण; तथा — भी; मत्-भावाः — मुझसे उत्पन्न; मानसाः — मन से; जाताः — उत्पन्न; येषाम् — जिनकी; लोके — संसार में ; इमाः — ये सब; प्रजाः — संतानें, जीव।

तात्पर्य — सप्तर्षिगण तथा उनसे भी पूर्व चार अन्य महर्षि एवं सारे मनु ( मानवजाति के पूर्वज ) सब मेरे मन से उत्पन्न हैं और विभिन्न लोकों में निवास करने वाले सारे जीव उनसे अवतरित होते हैं।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।। 7 ।। 

एताम् — इस सारे; विभूतिम् — ऐश्वर्य को; योगम् — योग को; च — भी; मम — मेरा; यः — जो कोई; वेत्ति — जानता है; तत्त्वतः — सही-सही; सः — वह; अविकल्पेन — निश्चित रूप से; योगेन — भक्ति से; युज्यते — लगा रहता है; न — कभी नहीं; अत्र — यहाँ ; संशयः — सन्देह, शंका। 

तात्पर्य — जो मेरे इस ऐश्वर्य तथा योग से पूर्णतया आश्वस्त है, वह मेरी अन्नय भक्ति में तत्पर होता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।

आगे के श्लोक :–

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