Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan / भगवान् की व्यापकता का कथन

अध्याय सात भगवद्ज्ञान

Sampurn Padarthon Mein Karan Rup Se Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan 
सम्पूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान् की व्यापकता का कथन

Sampurn Padarthon Mein Karan Rup Se Bhagwan Ki Vyapakta Ka Kathan, सम्पूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान् की व्यापकता का कथन। हे कुन्तीपुत्र ! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मंत्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ। मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ। मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ। हे पृथापुत्र ! यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवों का आदि बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरुषों का तेज हूँ। 

श्लोक 8 से 12

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ।। 8 ।।

रसः — स्वाद; अहम् — मैं; अप्सु — जल में; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; प्रभा — प्रकाश; अस्मि — हूँ; शशि-सूर्ययोः — चन्द्रमा तथा सूर्य का; प्रणवः — ओंकार के अ, उ, म ये तीन अक्षर; सर्व — समस्त; वेदेषु — वेदों में; शब्दः — शब्द, ध्वनि; खे — आकाश में; पौरुषम् — शक्ति, सामर्थ्य; नृषु — मनुष्यों में। 

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मंत्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ।। 9 ।।

पुण्यः — मूल, आद्य; गन्धः — सुगन्ध; पृथिव्याम् — पृथ्वी में; च — भी; तेजः — प्रकाश; च — भी; अस्मि — हूँ; विभावसौ — अग्नि में; जीवनम् — प्राण; सर्व — समस्त; भूतेषु — जीवों में; तपः — तपस्या; च — भी; अस्मि — हूँ; तपस्विषु — तपस्वियों में। 

तात्पर्य — मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ। मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  2. अध्याय छह — ध्यानयोग
  3. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  4. 1 से 7 — विज्ञान सहित ज्ञान का विषय

 बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।। 10 ।।

बीजम् — बीज; माम् — मुझको; सर्व-भूतानाम् — समस्त जीवों का; विद्धि — जानने का प्रयास करो; पार्थ — हे पृथापुत्र; सनातनम् — आदि, शाश्वत; बुद्धिः — बुद्धि; बुद्धि मताम् — बुद्धिमानों की; अस्मि — हूँ; तेजः — तेज; तेजस्विनाम् — तेजस्वियों का; अहम् — मैं।

तात्पर्य — हे पृथापुत्र ! यह जान लो कि मैं ही समस्त जीवों का आदि बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि तथा समस्त तेजस्वी पुरुषों का तेज हूँ।

 बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।। 11 ।।

बलम् — शक्ति; बल-वताम् — बलवानों का; च — तथा; अहम् — मैं हूँ; काम — विषयभोग; राग — तथा आसक्ति से; विवर्जितम् — रहित; धर्म-अविरुद्धः — जो धर्म के विरुद्ध नहीं हैं; भूतेषु — समस्त जीवों में; कामः — विषयी जीवन; अस्मि — हूँ; भरत-ऋषभ — हे भारतवंशियों में श्रेष्ठ। 

तात्पर्य — मैं बलवानों का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूँ। हे भरतश्रेष्ठ ( अर्जुन ) ! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।

 ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।। 12 ।।

ये — जो; च — तथा; एव — निश्चय ही; सात्त्विका — सतोगुणी; भावाः — भाव; राजसाः — रजोगुणी; तामसाः — तमोगुणी; च — भी; ये — जो; मत्तः — मुझसे; एव — निश्चय ही; इति — इस प्रकार; तान् — उनको; विद्धि — जानो; न — नहीं; तु — लेकिन; अहम् — मैं; तेषु — उनमें; ते — वे; मयि — मुझमें। 

तात्पर्य — तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं, चाहे वह सतगुण हों, रजोगुण हों या तमोगुण हों। एक प्रकार से मैं सब कुछ हूँ, किन्तु हूँ स्वतन्त्र। मैं प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ, अपितु वे मेरे अधीन हैं।

आगे के श्लोक :–

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