Bhagwat Prapt Purushon Ke Lakshan / भगवत् प्राप्त पुरुष

Bhagwat Prapt Purushon Ke Lakshan
भगवत् प्राप्त पुरुषों के लक्षण

Bhagwat Prapt Purushon Ke Lakshan, भगवत् प्राप्त पुरुषों के लक्षण- जो मित्रों तथा शत्रुओं के लिए समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुःख, यश तथा अपयश में समभाव रखता है, जो दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है, जो सदैव मौन और किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ है और जो भक्ति में संलग्न है — ऐसा पुरुष मुझे अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 13 से 20

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कार समदुःखसुखः क्षमी ।। 13 ।।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ।। 14 ।।

अद्वेष्टा — ईर्ष्याविहीन; सर्व-भूतानाम् — समस्त जीवों के प्रति; मैत्रः — मैत्रीभाव वाला; करुणः — दयालु; एव — निश्चय ही; च — भी; निर्ममः — स्वामित्व की भावना से रहित; निरहङ्कार — मिथ्या अहंकार से रहित; सम — समभाव; दुःख — दुःख; सुखः — तथा सुख में ; क्षमी — क्षमावान; संतुष्टः — प्रसन्न, तुष्ट ; सततम् — निरन्तर; योगी — भक्ति में निरत; यत-आत्मा — आत्मसंयमी; दृढ-निश्चयः — संकल्प सहित; मयि — मुझमें ; अर्पित — संलग्न; मनः — मन को; बुद्धिः — तथा बुद्धि को; यः — जो; मत्-भक्तः — मेरा भक्त; सः — वह; मे — मेरा; प्रियः — प्यारा। 

तात्पर्य — जो किसी से द्वेष नहीं करता, लेकिन सभी जीवों का दयालु मित्र है, जो अपने को स्वामी नहीं मानता और मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुःख में समभाव रहता है, सहिष्णु है, सदैव आत्मतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है तथा जो निश्चय के साथ मुझमें मन तथा बुद्धि स्थिर करके भक्ति में लगा रहता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है।

 यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ।। 15 ।।

यस्मात् — जिससे; न — कभी नहीं ; उद्विजते — उद्विग्न होते हैं ; लोकः — लोग; लोकात् — लोगों से; न — कभी नहीं ; उद्विजते — विचलित होता है; च — भी; यः — जो; हर्ष — सुख; अमर्ष — दुःख; भय — भय; उद्वेगैः — तथा चिन्ता से; मुक्तः — मुक्त; यः — जो; सः — वह; च — भी; मे — मेरा; प्रियः — प्रिय। 

तात्पर्य — जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं किया जाता, जो सुख-दुःख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
  2. अध्याय बारह — भक्तियोग
  3. 1 से 12 — साकार निराकार के उपासक और भगवत्प्राप्ति के उपाय

 अनपेक्षः श्रुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ।। 16 ।।

अनपेक्षः — इच्छारहित; श्रुचिः — शुद्ध; दक्षः — पटु; उदासीनः — चिन्ता से मुक्त; गत-व्यथः — सारे कष्टों से मुक्त; सर्व-आरम्भ — समस्त प्रयत्नों का; परित्यागी — परित्याग करने वाला; यः — जो; मत्-भक्तः — मेरा भक्त; सः — वह; मे — मेरा; प्रियः — अतिशय प्रिय। 

तात्पर्य — मेरा ऐसा भक्त, जो सामान्य कार्य-कलापों पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध है, दक्ष है, चिन्तारहित है, समस्त कष्टों से रहित है और किसी फल के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता, मुझे अतिशय प्रिय है।

 यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काड्क्षति ।
श्रुभाश्रुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ।। 17 ।।  

यः — जो; न — कभी नहीं ; हृष्यति — हर्षित होता है; न — कभी नहीं ; द्वेष्टि — शोक करता है; न — कभी नहीं ; शोचति — पछतावा करता है ; न — कभी नहीं ; काड्क्षति — इच्छा करता है ; श्रुभ — शुभ; अश्रुभ — तथा अशुभ का; परित्यागी — त्याग करने वाला; भक्ति-मान् — भक्त; यः — जो; सः — वह है; मे — मेरा; प्रियः — प्रिय।

तात्पर्य — जो न कभी हर्षित होता है, न शोक करता है, जो न पछताता है, न इच्छा करता है, तथा जो शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओं का परित्याग कर देता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ।। 18 ।।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ।। 19 ।।

समः — समान; शत्रौ — शत्रु में ; च — तथा; मित्रे — मित्र में ; च — भी; तथा — उसी प्रकार; मान — सम्मान; अपमानयोः — तथा अपमान में ; शीत — जाड़ा; उष्ण — गर्मी ; सुख — सुख; दुःखेषु — तथा दुःख में ; समः — समभाव; सङ्ग-विवर्जितः — समस्त संगति से मुक्त; तुल्य — समान; निन्दा — अपयश; स्तुतिः — तथा यश में ; मौनी — मौन; संतुष्टः — संतुष्ट; येन केनचित् –जिस किसी तरह; अनिकेतः — बिना घर बार के; स्थिर — दृढ; मतिः — संकल्प; भक्ति-मान् —  भक्ति में रत; मे — मेरा; प्रियः — प्रिय; नरः — मनुष्य ।

तात्पर्य — जो मित्रों तथा शत्रुओं के लिए समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुःख, यश तथा अपयश में समभाव रखता है, जो दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है, जो सदैव मौन और किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ है और जो भक्ति में संलग्न है — ऐसा पुरुष मुझे अत्यन्त प्रिय है।

ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ।। 20 ।।

ये — जो; तु — लेकिन; धर्म — धर्म रूपी; अमृतम् — अमृत को; इदम् — इस; यथा — जिस तरह से, जैसा; उक्तम् — कहा गया; पर्युपासते — पूर्णतया तत्पर रहते हैं ; श्रद्दधानाः — श्रद्धा के साथ; मत्-परमाः — मुझ परमेश्वर को सब कुछ मानते हुए; भक्ताः — भक्तजन; ते — वे; अतीव — अत्यधिक; मे — मेरे ; प्रियाः — प्रिय ।

तात्पर्य — जो इस भक्ति के अमर पथ का अनुसरण करते हैं और जो मुझे ही अपना चरम लक्ष्य बना कर श्रद्धासहित पूर्णरूपेण संलग्न रहते हैं, वे भक्त मुझे अत्यधिक प्रिय हैं ।

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवें अध्याय ” भक्तियोग ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

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