Bhagwat Prapti Ka Upay / भगवत प्राप्ति का उपाय

Bhagwat Prapti Ka Upay Aur Gunatit Purush Ke Lakshan
भगवत प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण

Bhagwat Prapti Ka Upay Aur Gunatit Purush Ke Lakshan, भगवत प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण- भगवान् ने कहा- हे पाण्डुपुत्र ! जो प्रकाश, आसक्ति तथा मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है, जो भौतिक गुणों की इन समस्त प्रतिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है और यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, उदासीन तथा दिव्य बना रहता है। 

श्लोक 19 से 27

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ।। 19 ।।

न — नहीं ; अन्यम् — दूसरा ; गुणेभ्यः — गुणों के अतिरिक्त ; कर्तारम् — कर्ता ; यदा — जब ; द्रष्टा — देखने वाला ; अनुपश्यति — ठीक से देखता है ; गुणेभ्यः — गुणों से ; च — तथा ; परम् — दिव्य ; वेत्ति — जानता है ; मत्-भावम् — मेरे दिव्य स्वभाव को ; सः — वह ; अधिगच्छति — प्राप्त होता है।

तात्पर्य — जब कोई यह अच्छी तरह जान लेता है कि समस्त कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई कर्ता नहीं है और जब वह परमेश्वर को जान लेता है, जो इन तीनों गुणों से परे है, तो वह मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तो मृतमश्रुन्ते ।। 20 ।।

गुणान् — गुणों को ; एतान् — इन सब ; अतीत्य — लाँघ कर ; त्रीन् — तीन ; देही — देहधारी ; देह — शरीर ; समुद्भवान् — उत्पन्न ; जन्म — जन्म ; मृत्यु — मृत्यु ; जरा — बुढ़ापे का ; दुःखैः — दुःखों से ; विमुक्तः — मुक्त ; अमृतम् — अमृत ; अश्रुन्ते — भोगता है ।

तात्पर्य — जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन तीनों गुणों को लाँघने में समर्थ होता है, तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा तथा उनके कष्टों से मुक्त हो सकता है और इस जीवन में अमृत का भोग कर सकता है।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय बारह — भक्तियोग
  2. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
  3. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग

अर्जुन उवाच — 
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।। 21 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा ; कैः — किन ; लिङ्गै — लक्षणों से ; त्रीन् — तीनों ; गुणान् — गुणों को ;  एतान् — ये सब ; अतीतः — लाँघा हुआ ; भवति — है ; प्रभो — प्रभु ; किम् — क्या ; आचारः — आचरण ; कथम् — कैसे ; च — भी ; एतान् — ये ; त्रीन् — तीनों ; गुणान् — गुणों को ; अतिवर्तते — लाँघता है ।

तात्पर्य — अर्जुन ने पूछा — हे भगवान् ! जो इन तीनों गुणों से परे है, वह किन लक्षणों के द्वारा जाना जाता है ? उसका आचरण कैसा होता है ? और वह प्रकृति के गुणों को किस प्रकार लाँघता है ?

श्रीभगवानुवाच — 
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव

न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ।। 22 ।।

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ।। 23 ।।

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।। 24 ।।

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ।। 25 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा ; प्रकाशम् — प्रकाश ; च — तथा ; प्रवृत्तिम् — आसक्ति ; च — तथा ; मोहम् — मोह ; एव च — भी ; पाण्डव — हे पाण्डुपुत्र ; न द्वेष्टि — घृणा नहीं करता ; सम्प्रवृत्तानि — यद्यपि विकसित होने पर ; न निवृत्तानि — न ही विकास के रुकने पर ; काङ्क्षति — चाहता है ; उदासीन-वत् — निरपेक्ष की भाँति ; आसीनः — स्थित ; गुणैः — गुणों के द्वारा ; यः — जो ; न — कभी नहीं ; विचाल्यते — विचलित होता है ; गुणाः — गुण ; वर्तन्ते — कार्यशील होते हैं ; इति एवम् — इस प्रकार जानते हुए ; यः — जो ; अवतिष्ठति — रहा आता है ; न — कभी नहीं ; इङ्गते — हिलता डुलता है ; सम — समान ; दुःख — दुःख ; सुखः — तथा सुख में ; स्व-स्थः — अपने में स्थित ; सम — समान रूप से ; लोष्ट — मिट्टी का ढेला ; अश्म — पत्थर ; काञ्चनः — सोना ; तुल्य — समभाव ; प्रिय — प्रिय ; अप्रियः — तथा अप्रिय को ; धीरः — धीर ; तुल्य — समान ; निन्दा — बुराई ; आत्म-संस्तुतिः — तथा अपनी प्रशंसा में ; मान — सम्मान ; अपमानयोः — तथा अपमान में ; तुल्यः — समान ; मित्र — मित्र ; अरि — तथा शत्रु के ; पक्षयोः — पक्षों या दलों को ; सर्व — सबों का ; आरम्भ — प्रयत्न, उद्यम ; परित्यागी — त्याग करने वाला ; गुण-अतीतः — प्रकृति के गुणों से परे ; सः — वह ; उच्यते — कहा जाता है ।

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — हे पाण्डुपुत्र ! जो प्रकाश, आसक्ति तथा मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है, जो भौतिक गुणों की इन समस्त प्रतिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है और यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, उदासीन तथा दिव्य बना रहता है, जो अपने आपमें स्थित है और सुख तथा दुःख को एकसमान मानता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है, जो अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्रति समान बना रहता है, जो धीर है और प्रशंसा तथा बुराई, मान तथा अपमान में समान भाव से रहता है, जो शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करता है और जिसने सारे भौतिक कार्यों का परित्याग कर दिया है, ऐसे व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से अतीत कहते हैं ।

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। 26 ।। 

माम् — मेरी ; च — भी ; यः — जो व्यक्ति ; अव्यभिचारेण — बिना विचलित हुए ; भक्ति-योगेन — भक्ति से ; सेवते — सेवा करता है ; सः — वह ; गुणान् — प्रकृति के गुणों को ; समतीत्य — लाँघ कर ; एतान् — इन सब ; ब्रह्म-भूयाय — ब्रह्म पद तक ऊपर उठा हुआ ; कल्पते — हो  जाता है ।

तात्पर्य — जो समस्त परिस्थितयों में अविचलित भाव से पूर्ण भक्ति में प्रवृत्त होता है, वह तुरन्त ही प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है ।

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।। 27 ।।

ब्रह्मणः — निराकार ब्रह्म ज्योति का ; हि — निश्चय ही ; प्रतिष्ठा — आश्रय ; अहम् — मैं हूँ ; अमृतस्य — अमर्त्य का ; अव्ययस्य — अविनाशी का ; च — भी ; शाश्वतस्य — शाश्वत का ; च — तथा ; धर्मस्य — स्वाभाविक स्थिति ( स्वरुप ) का ; सुखस्य — सुख का; ऐकान्तिकस्य — चरम, अन्तिम ; च — भी।

तात्पर्य — और मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूँ, जो अमर्त्य, अविनाशी तथा शाश्वत है और चरम सुख का स्वाभाविक पद है ।

आगे के श्लोक :–

   इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय ” प्रकृति के तीन गुण ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

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