Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan / भक्ति सहित ध्यान योग

Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan
भक्ति सहित ध्यान योग का वर्णन

Bhakti Sahit Dhyan Yog Ka Varnan, भक्ति सहित ध्यान योग का वर्णन। समस्त इन्द्रियविषयों को बाहर करके, दृष्टि को भौहों के मध्य में केंद्रित करके, प्राण तथा अपान वायु के नथुनों के भीतर रोककर और इस तरह मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके, जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है, वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है। —

श्लोक 27 से 29

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। 27 ।।

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ।। 28 ।।

स्पर्शान् — इन्द्रियविषयों यथा ध्वनि को; कृत्वा — करके; बहिः — बाहरी; बाह्यान् — अनावश्यक; चक्षुः — आंखें; च — भी; एव — निश्चय ही; अन्तरे — मध्य में; भ्रुवोः — भौहों के; प्राण-अपानौ — ऊर्ध्व तथा अधोगामी वायु; समौ — रुद्ध; कृत्वा — करके; नास-अभ्यन्तर — नथुनों के भीतर; चारिणौ — चलने वाले; यत — संयमित; इन्द्रिय — इन्द्रियाँ; मनः — मन; बुद्धिः — बुद्धि; मुनिः — योगी; मोक्ष — मोक्ष के लिए; परायणः — तत्पर; विगत — परित्याग करके; इच्छा — इच्छाएँ; भय — डर; क्रोधः — क्रोध; यः — जो; सदा — सदैव; मुक्तः — मुक्त; एव — निश्चय ही; सः — वह।

तात्पर्य — समस्त इन्द्रियविषयों को बाहर करके, दृष्टि को भौहों के मध्य में केंद्रित करके, प्राण तथा अपान वायु के नथुनों के भीतर रोककर और इस तरह मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके, जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है, वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में 
  2. अध्याय चार — दिव्य ज्ञान
  3. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  4. अध्याय छह — ध्यानयोग

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छती ।। 29 ।।

भोक्तारम् — भोगने वाला, भोक्ता; यज्ञ — यज्ञ; तपसाम् — तपस्या का; सर्व-लोक — सम्पूर्ण लोकों तथा उनके देवताओं का; महा-ईश्वरम् — परमेश्वर; सु-हृदम् — उपकारी; सर्व — समस्त; भूतानाम् — जीवों का; ज्ञात्वा — इस प्रकार जानकर; माम् — मुझ ( कृष्ण ) को; शान्तिम् — भौतिक यातना से मुक्त; ऋच्छति — प्राप्त करता है।

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