Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay / भक्ति सहित कर्मयोग

अध्याय अठारह उपसंहार

Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay
भक्ति सहित कर्मयोग का विषय

Bhakti Sahit Karmyog Ka Vishay, भक्ति सहित कर्मयोग का विषय- मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है। सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो। यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे। लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे।

श्लोक 56 से 66

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ।। 56 ।।

सर्व — समस्त ; कर्माणि — कार्यकलाप को ; अपि — यद्यपि ; सदा — सदैव ; कुर्वाणः — करते हुए ; मत्-व्यपाश्रयः — मेरे संरक्षण में ; मत्-प्रसादात् — मेरी कृपा से ; अवाप्नोति — प्राप्त करता है ; शाश्वतम् — नित्य ; पदम् — धाम को ; अव्ययम् — अविनाशी ।

तात्पर्य — मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ।। 57 ।।  

चेतसा — बुद्धि से ; सर्व-कर्माणि — समस्त प्रकार के कार्य ; मयि — मुझ में ; सन्न्यस्य — त्यागकर ; मत्-परः — मेरे संरक्षण में ; बुद्धि-योगम् — भक्ति के कार्यों की ; उपाश्रित्य — शरण लेकर ; मत्-चित्तः — मेरी चेतना में ; सततम् — चौबीस घंटे ; भव — होओ ।

तात्पर्य — सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो।

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ।। 58 ।।

मत् — मेरी ; चित्तः — चेतना में ; सर्व — सारी ; दुर्गाणि — बाधाओं को ; मत्-प्रसादात् — मेरी कृपा से ; तरिष्यसि — तुम पार कर सकोगे ; अथ — लेकिन ; चेत् — यदि ; त्वम् — तुम ; अहङ्कारात् — मिथ्या अहंकार से ; न श्रोष्यसि — नहीं सुनते हो ; विनङ्क्ष्यसि — नष्ट हो जाओगे ।

तात्पर्य — यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे। लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे ।

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यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ।। 59 ।।

यत् — यदि ; अहङ्कारम् — मिथ्या अहंकार की ; आश्रित्य — शरण लेकर ; न योत्स्ये — मैं नहीं लड़ूँगा ; इति — इस प्रकार ; मन्यसे — तुम सोचते हो ; मिथ्या एषः — तो यह सब झूठ है ; व्यवसायः — संकल्प ; ते — तुम्हारा ; प्रकृतिः — भौतिक प्रकृतिः ; त्वाम् — तुमको ; नियोक्ष्यति — लगा लेगी।

तात्पर्य — यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे। तुम्हें अपने स्वभाववश युद्ध में लगना होगा।

 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ।। 60 ।।

स्वभाव-जेन — अपने स्वभाव से उत्पन्न ; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र ; निबद्धः — बद्ध ; स्वेन — तुम अपने ; कर्मणा — कार्यकलापों से ; कर्तुम् — करने के लिए ; न — नहीं ; इच्छसि — इच्छा करते हो  ; यत् — जो ; मोहात् — मोह से ; करिष्यसि — करोगे ; अवशः — अनिच्छा से ; अपि — भी ; तत् — वह।

तात्पर्य — इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो। लेकिन हे कुन्तीपुत्र ! तुम अपने ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ।। 61 ।।

ईश्वरः — भगवान् ; सर्व-भूतानाम् — समस्त जीवों के ; हृत्-देशे — ह्रदय में ; अर्जुन — हे अर्जुन ; तिष्ठति — वास करता है ; भ्रामयन् — भ्रमण करने के लिए बाध्य करता हुआ ; सर्व-भूतानि — समस्त जीवों को ; यन्त्र — यन्त्र में ; आरुढानि — सवार, चढ़े हुए ; मायया — भौतिक शक्ति के वशीभूत होकर। 

तात्पर्य — हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के ह्रदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा ( भरमा ) रहे हैं।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। 
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।। 62 ।।

तम् — उसकी ; एव — निश्चय ही ; शरणम् गच्छ — शरण में जाओ ; सर्व-भोजन — सभी प्रकार से ; भारत — हे भरतपुत्र ; तत्-प्रसादात् — उसकी कृपा से ; पराम् — दिव्य ; शान्तिम् — शान्ति को ; स्थानम् — धाम को ; प्राप्स्यसि — प्राप्त करोगे ; शाश्वतम् — शाश्वत ।

तात्पर्य — हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शांति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे ।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ।। 63 ।।

इति — इस प्रकार ; ते — तुमको ; ज्ञानम् — ज्ञान ; आख्यातम् — वर्णन किया गया ; गुह्यात् — गुह्य से ; गुह्य-तरम् — अधिक गुह्य ; मया — मेरे द्वारा ; विमृश्य — मनन करके ; एतत् — इस ; अशेषेण — पूर्णतया ; यथा — जैसी ; इच्छसि — इच्छा हो ; तथा — वैसा ही ; कुरु — करो ।

तात्पर्य — इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बतला दिया। इस पर पूरी तरह से मनन करो और तब जो चाहो सो करो ।

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