Bhakti Yog Ka Vishay / भक्ति योग का विषय

अध्याय आठ भगवत्प्राप्ति

Bhakti Yog Ka Vishay
भक्ति योग का विषय

Bhakti Yog Ka Vishay, भक्ति योग का विषय- हे पार्थ ! जो व्यक्ति मेरा स्मरण करने में अपना मन निरन्तर लगाये रखकर अविचलित भाव से भगवान् के रूप में मेरा ध्यान करता है, वह मुझको अवश्य ही प्राप्त होता है। मनुष्य को चाहिए कि परमपुरुष का ध्यान सर्वज्ञ, पुरातन, नियन्ता, लघुतम से भी लघुतर, प्रत्येक का पालन- कर्ता, समस्त भौतिकबुद्धि से परे, अचिन्त्य तथा नित्य पुरुष के रूप में करे। वे सूर्य की भाँति तेजवान हैं और इस भौतिक प्रकृति से परे, दिव्य रूप हैं। 

श्लोक 8 से 22

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।। 8 ।।

अभ्यास-योग — अभ्यास से; युक्तेन — ध्यान में लगे रहकर; चेतसा — मन तथा बुद्धि से; न अन्य-गामिना — बिना विचलित हुए; परमम् — परम; पुरषम् — भगवान् को; दिव्यम् — दिव्य; याति — प्राप्त करता है; पार्थ — हे पृथापुत्र; अनुचिन्तयन् — निरन्तर चिन्तन करता हुआ।

तात्पर्य — हे पार्थ ! जो व्यक्ति मेरा स्मरण करने में अपना मन निरन्तर लगाये रखकर अविचलित भाव से भगवान् के रूप में मेरा ध्यान करता है, वह मुझको अवश्य ही प्राप्त होता है।

कविं पुराणमनुशसितार-
                 मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
                            मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।। 9 ।।

कविम् — सर्वज्ञ; पुराणम् — प्राचीनतम, पुरातन; अनुशासितारम् — नियन्ता; अणोः — अणु की तुलना में; अणीयांसम् — लघुतर; अनुस्मरेत् — सदैव सोचता है; यः — जो; सर्वस्य — हर वस्तु का; धातारम् — पालक; अचिन्त्य — अकल्पनीय; रूपम् — जिसका स्वरुप; आदित्य-वर्णम् — सूर्य के समान प्रकाशमान; तमसः — अंधकार से; परस्तात् — दिव्य, परे।

तात्पर्य — मनुष्य को चाहिए कि परमपुरुष का ध्यान सर्वज्ञ, पुरातन, नियन्ता, लघुतम से भी लघुतर, प्रत्येक का पालन- कर्ता, समस्त भौतिकबुद्धि से परे, अचिन्त्य तथा नित्य पुरुष के रूप में करे। वे सूर्य की भाँति तेजवान हैं और इस भौतिक प्रकृति से परे, दिव्य रूप हैं।

 प्रयाणकाले मनसाचलेन
                      भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य-
                                क्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।। 10 ।।

प्रयाण-काले — मृत्यु के समय; मनसा — मन से; अचलेन — अचल, दृढ; भक्त्या — भक्ति से; युक्तः — लगा हुआ; योग-बलेन — योग शक्ति के द्वारा; च — भी; एव — निश्चय ही; भ्रुवोः — दोनों भौहों के; मध्ये — मध्य में; प्राणम् — प्राण को; आवेश्य — स्थापित करे; सम्यक् — पूर्णतया; सः — वह; तम् — उस; परम् — दिव्य; पुरुषम् — भगवान् को; उपैति — प्राप्त करता है; दिव्यम् — दिव्य भगवद्धाम को।

तात्पर्य — मृत्यु के समय जो व्यक्ति अपने प्राण को भौहों के मध्य स्थिर कर लेता है और योगशक्ति के द्वारा अविचलित मन से पूर्णभक्ति के साथ परमेश्वर के स्मरण में अपने को लगाता है, वह निश्चित रूप से भगवान् को प्राप्त होता है।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
                          विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
                               तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ।। 11 ।।

यत् — जिस; अक्षरम् — अक्षर ॐ का; वेद-विदः — वेदों के ज्ञाता; वदन्ति — कहते हैं; विशन्ति — प्रवेश करते हैं; यत् — जिसमें; यतयः — बड़े-बड़े मुनि; वीत-रागाः — संन्यास आश्रम में रहने वाले सन्यासी; यत् — जो; इच्छन्तः — इच्छा करने वाले; ब्रह्मचर्यम् — ब्रह्मचर्य का; चरन्ति — अभ्यास करते हैं; तत् — उस; ते — तुमको; पदम् — पद को; सङ्ग्रहेण — संक्षेप में; प्रवक्ष्ये — मैं बतलाऊँगा।

तात्पर्य — जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो ओंकार का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास आश्रम के बड़े-बड़े मुनि हैं, वे ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी सिद्धि की इच्छा करने वाले ब्रह्मचर्यव्रत का अभ्यास करते हैं। अब मैं तुम्हें वह विधि बताऊँगा, जिससे कोई भी व्यक्ति मुक्ति-लाभ कर सकता है।

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  1. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  2. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  3. 1 से 7 — विज्ञानसहित ज्ञान का विषय

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मुध्नर्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ।। 12 ।।

सर्व-द्वाराणि — शरीर के समस्त द्वारों को; संयम्य — वश में करके; मनः — मन को; हृदि — हृदय में; निरुध्य — बन्द कर; च — भी; मुधिर्न — सिर पर; आधाय — स्थिर करके; आत्मनः — अपने; प्राणम् — प्राणवायु को; आस्थितः — स्थित; योग-धारणाम् — योग की स्थिति।

तात्पर्य — समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं से विरक्ति को योग की स्थिति ( योगधारणा ) कहा जाता है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को सिर पर केन्द्रित करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है।

ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।। 13 ।।

ॐ — ओंकार; इति — इस तरह; एक-अक्षरम् — एक अक्षर; ब्रह्म — परब्रह्म का; व्याहरन् — उच्चारण करते हुए; माम् — मुझको ( कृष्ण को ); अनुस्मरन् — स्मरण करते हुए; यः — जो; प्रयाति — जाता है; त्यजन् — छोड़ते हुए; देहम् —  इस शरीर को; सः — वह; याति — प्राप्त करता है; परमाम् — परम; गतिम् — गन्तव्य, लक्ष्य। 

तात्पर्य — इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग यानी ओंकार का उच्चारण करते हुए यदि कोई भगवान् का चिन्तन करता है और अपने शरीर का त्याग करता है, तो वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक लोकों को जाता है।

 अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।। 14 ।।

अनन्य-चेताः — अविचलित मन से; सततम् — सदैव; यः — जो; माम् — मुझ ( कृष्ण ) को; स्मरति — स्मरण करता है; नित्यशः — नियमित रूप से; तस्य — उस; अहम् — मैं हूँ; सुलभः — सुलभ, सरलता से प्राप्य; पार्थ — हे पृथापुत्र; नित्य — नियमित रूप से; युक्तस्य — लगे हुए; योगिनः — भक्त के लिए। 

तात्पर्य — हे अर्जुन ! जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण करता है उसके लिए मैं सुलभ हूँ, क्योंकि वह मेरी भक्ति में प्रवृत्त रहता है।

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