Bharat Kausalya Samwad / भरत कौसल्या संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bharat Kausalya Samwad Aur Dashrathji Ki Antyeshti Kriya
भरत कौसल्या संवाद और दशरथजी की अन्त्येष्टि क्रिया

Bharat Kausalya Samwad Aur Dashrathji Ki Antyeshti Kriya, भरत कौसल्या संवाद और दशरथजी की अन्त्येष्टि क्रिया :- भरत को देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर की सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े। पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतु के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है ! मैं बाँस के वन में आग उत्पन्न्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषों का भागी बना। भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आँसू बहाने लगीं।

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयउ ।।
बार मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ।।

अर्थात् :- अरी कुमति ! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार ( निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े [ क्यों ] न हो गये ? वरदान माँगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई ? तेरी जीभ गल नहीं गयी ? तेरे मुँह में कीड़े नहीं पड़ गये ?

भूपँ प्रतीति तोरि किमि किन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ।।
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी ।।

अर्थात् :- राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया ? [ जान पड़ता है, ] विधाता ने मरने से पहले उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियों की हृदय की गति ( चाल ) विधाता भी नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।

सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ ।।
अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ।।

अर्थात् :- फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभाव को कैसे जानते ? अरे,जगत् के जीव-जन्तुओं में ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणों के समान प्यारे नहीं हैं।

भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही ।।
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहि जाई ।।

अर्थात् :- वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये ( वैरी लगे ) ! तू कौन है ? मुझे सच-सच कह ! तू जो है, सो है, अब मुँह में स्याही पोतकर ( मुँह काला करके ) उठकर मेरी आँखों की ओठ में जा बैठ।

दो० — राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ।। 162 ।।

अर्थात् :- विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करने वाले ( तेरे ) हृदय से उत्पन्न किया [ अथवा विधाता ने मुझे हृदय से राम का विरोधी जाहिर कर दिया ]। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है ? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ।

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई ।।
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई ।।

अर्थात् :- माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अङ्ग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँति के कपड़ों और गहनों से सजकर कुबरी ( मन्थरा ) वहाँ आयी।

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई ।।
हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा ।।

अर्थात् :- उसे [ सजी ] देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गये। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोर से तककर कूबड़ पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ी।

कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ।।
आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा ।।

अर्थात् :- उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँह से खून बहने लगा। [ वह कराहती हुई बोली – ] हाय दैव ! मैंने क्या बिगाड़ा ? जो भला करते बुरा फल पाया।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ।।
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ।।

अर्थात् :- उसकी यह बात सुनकर और उसे नख से शिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़ कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई [ तुरंत ] कौसल्याजी के पास गये।

दो० — मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार ।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ।। 163 ।।

अर्थात् :- कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने है, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही है, दुःख के बोझ से शरीर सुख गया है। ऐसी दीख रही हैं मानो सोने की सुन्दर कल्पलता को वन में पाला मार गया हो।

भरतहि देखि मातु उठ धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई ।।
देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी ।।

अर्थात् :- भरत को देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर की सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े।

मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ।।
कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ।।

अर्थात् :- [ फिर बोले – ] माता ! पिताजी कहाँ हैं ? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मणजी कहाँ हैं ? [ उन्हें दिखा दे। ] कैकेयी जगत् में क्यों जनमी ! और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई ?

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ।।
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति ऐसी तोरि मातु जेहि लागी ।।

अर्थात् :- जिसने कुल के कलंक, अपयश के भाँडे और प्रियजनों के द्रोही मुझ-जैसे पुत्र को उत्पन्न किया। तीनों लोकों में मेरे समान अभागा कौन है ? जिसके कारण, हे माता ! तेरी यह दशा हुई !

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू ।।
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी ।।

अर्थात् :- पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतु के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है ! मैं बाँस के वन में आग उत्पन्न्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषों का भागी बना।

दो० — मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि ।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ।। 164 ।।

अर्थात् :- भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आँसू बहाने लगीं।

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए ।।
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ।।

अर्थात् :- सरल स्वभाव वाली माता ने बड़े प्रेम से भरतजी को छाती से लगा लिया, मानो श्रीरामजी लौटकर आये हों। फिर लक्ष्मणजी के छोटे भाई को शत्रुघ्नजी को हृदय से लगाया। शोक और स्नेह हृदय में समाता नहीं है।

देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस कहे न होई ।।
माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे ।।

अर्थात् :- कौसल्या जी का स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं – श्रीरामजी की माता का ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माता ने भरतजी को गोद में बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोली। –

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ।।
जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी ।।

अर्थात् :- हे वत्स ! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज करो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्म की गति अमिट जानकर हृदय में हानि और ग्लानि मत मानो।

काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ।।
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ।।

अर्थात् :- हे तात ! किसी को दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकार से उलटा हो गया है, जो इतने दुःख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है,, उसे क्या भा रहा है।

दो० — पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर ।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ।। 165 ।।

अर्थात् :- हे तात ! पिता की आज्ञा से श्रीरघुवर ने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और वल्कल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदय में न कुछ विषाद था, न हर्ष !

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू ।।
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी ।।

अर्थात् :- उनका मुख प्रसन्न था ; मुख में आसक्ति थी, न रोष ( द्वेष )। सबका सब तरह से सन्तोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामजी के चरणों की अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं।

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा ।।
तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई ।।

अर्थात् :- सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथ ने उन्हें रोकने के बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मण को साथ लेकर चले गये।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए ।।
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें ।।

अर्थात् :- श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखों सामने हुआ। तो भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा।

मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी ।।
जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना ।।

अर्थात् :- अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती ; राम-सरीखे पुत्र की मैं माता ! जीना और मरना तो राजा खूब जाना। मेरा हृदय तो सैंकड़ों वज्रों के समान कठोर है।

दो० — कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु ।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ।। 166 ।।

अर्थात् :- कौसल्याजी के वचनों को सुनकर भरत सहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोक का निवास बन गया।

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ।।
भाँति अनेक भरतु समझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए ।।

अर्थात् :- भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी को समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं।

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई ।।
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी ।।

अर्थात् :- भरतजी ने भी सब माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छल रहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले। –

जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ।।
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें ।।

अर्थात् :- जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं ; जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो मित्र और राजा को जहर देने से होते हैं। –

जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं ।।
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता ।।

अर्थात् :- कर्म, वचन और मन से होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक ( बड़े-छोटे पाप ) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं, हे विधाता ! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता ! वे सब पाप मुझे लगें।

दो० — जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर ।
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ।। 167 ।।

अर्थात् :- जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजी के चरणों को छोड़कर भयानक भूत-प्रेतों को भजते हैं, हे माता ! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे।

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