Bharat Nishad Milan Aur Samwad / भरत निषाद मिलन और संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bharat Nishad Milan Aur Samwad Ewam Bharatji Ka Tatha Nagarvasiyon Ka Prem
भरत निषाद मिलन और संवाद एवं भरतजी का तथा नगरवासियों का प्रेम


लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ । बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ।।

अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कंद मूल फल खग मृग मागे ।।

अर्थात् :- उनके सुन्दर स्वभाव से मैं उनको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट के समान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये। 

मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ।।
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाए ।।

अर्थात् :- कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियों के भार भर-भरकर लाये। भेंट का सामान सजाकर मिलने के लिये चले तो मङ्गलदायक शुभ-शकुन मिले। 

देखि दूरि तें कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ।।
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ।।

अर्थात् :- निषादराज ने मुनिराज वसिष्ठजी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर ही से दण्डवत् प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजी ने उनको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजी को समझाकर कहा [ कि यह श्रीरामजी का मित्र है ]। 

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ।।
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ।।

अर्थात् :- यह श्रीराम का मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम से उमँगते हुए चले। निषादराज गुह ने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वी पर माथा टेककर जोहार की। 

दो० — करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ ।
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ ।। 193 ।।

अर्थात् :- दण्डवत् करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजी से भेंट हो गयी हो।  

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती । लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ।।
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ।।

अर्थात् :- भरतजी गुह को अत्यन्त प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति को सब लोग सिहा रहे हैं ( ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं ), मङ्गल की मूल ‘ धन्य-धन्य ‘ की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं। 

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा । जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ।।
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता । मिलत पुलक परिपूरित गाता ।।

अर्थात् :- [ वे कहते हैं – ] जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया को छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से अँकवार भरकर ( हृदय से चिपटाकर ) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी [ आनन्द और प्रेमवश ] शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं। 

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ।।
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जगु पावन कीन्हा ।।

अर्थात् :- जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं ( अर्थात् आलस्य से भी जिनके मुँह से रामनाम का उच्चारण हो जाता है ), पापों के समूह ( कोई भी पाप ) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह की तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन ( जगत् को पवित्र करने वाला ) बना दिया। 

करमनास जलु सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ।।
उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ।।

अर्थात् :- कर्मनाशा नदी का जल गङ्गाजी में पड़ जाता है ( मिल जाता है ), तब कहिये, उसे कौन सिर पर धारण नहीं करता ? जगत् जानता है कि उलटा नाम ( मरा-मरा ) जपते-जपते वाल्मीकिजी ब्रह्म के समान हो गये। 

दो० — स्वपच खबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात ।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ।। 194 ।।

अर्थात् :- मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवन में विख्यात हो जाते हैं। 

नहिं अचिरिजु जुग जुग चलि आई । केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ।।
राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं ।।

अर्थात् :- इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी ? इस प्रकार देवता रामनाम की महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अयोध्या के लोग सुख पा रहे हैं। 

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ।।
देखि भरत कर सीलु सनेहू । भा निषाद तेहि समय बिदेहू ।।

अर्थात् :- रामसखा निषादराज से प्रेम के साथ मिलकर भरतजी ने कुशल, मङ्गल और क्षेम पूछी। भरतजी का शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया ( प्रेममुग्ध होकर देह की सुध भूल गया )। 

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा । भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ।।
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ।।

अर्थात् :- उसके मन में सनोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजी को देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजी के चरणों की वन्दना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा। –

कुसल मूल पद पंकज पेखी । मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ।।
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें । सहित कोटि कुल मंगल मोरें ।।

अर्थात् :- हे प्रभो ! कुशल के मूल आपके चरणकमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रह से करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों ) सहित मेरा मङ्गल ( कल्याण ) हो गया। 

दो० — समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ ।
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ।। 195 ।।

अर्थात् :- मेरी करतूत और कुल को समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की महिमा को मन में देख ( विचार ) कर ( अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करने वाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ! पर उन्होंने मुझ-जैसे नीच को भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया – यह समझकर ) जो रघुवीर श्रीरामजी के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत् में विधाता के द्वारा ठगा गया है। 

कपटी कायर कुमति कुजाती । लोक बेद बाहेर सब भाँती ।।
राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ।।

अर्थात् :- मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक-वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूँ। पर जब से श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं विश्व का भूषण हो गया। 

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ।।
कहि निषाद निज नाम सुबानीं । सादर सकल जोहारीं रानीं ।।

अर्थात् :- निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले-लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की। 

जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ।।
निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी ।।

अर्थात् :- रानियाँ उसे लक्ष्मणजी के समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षों तक सुखपूर्वक जिओ। नगर के स्त्री-पुरुष निषाद को देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजी को देख रहे हों।

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू । भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ।।
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई । प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ।।

अर्थात् :- सब कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी ने पाया है, जिसे कल्याण स्वरुप श्रीरामचन्द्रजी ने भुजाओं में बाँधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्य की बड़ाई सुनकर मन में परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला। 

दो० — सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ ।
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ।। 196 ।।

अर्थात् :- उसने अपने सब सेवकों को इशारे से कह दिया। वे स्वामी का रुख पाकर चले और उन्होंने घरों में, वृक्षों के नीचे, तालाबों पर तथा बगीचों और जंगलों में ठहरने के लिये स्थान बना दिये। 

सृंगबेरपुर भरत दीख जब । भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ।।
सोहत दिएँ निषादहि लागू । जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ।।

अर्थात् :- भरतजी ने जब शृंगवेरपुर को देखा, तब उनके सब अङ्ग प्रेम के कारण शिथिल हो गये। वे निषाद को लगा दिये ( अर्थात् उसके कंधे पर हाथ रखे चलते हुए ) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों। 

एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा । दीखि जाइ जग पावनि गंगा ।।
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ।।

अर्थात् :- इस प्रकार भरतजी ने सब सेना को साथ में लिये हुए जगत् को पवित्र करने वाली गङ्गाजी के दर्शन किये। श्रीरामघाट को [ जहाँ श्रीरामजी ने स्नान-सन्ध्या की थी ] प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्दमग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों। 

करहिं प्रनाम नगर नर नारी । मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ।।
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी । रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ।।

अर्थात् :- नगर के नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गङ्गाजी के ब्रह्मरूप जल को देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गङ्गाजी में स्नानकर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो ( अर्थात् बहुत अधिक हो )। 

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ।।
जोरि पानि बर मागउँ एहू । सीय राम पद सहज सनेहू ।।

अर्थात् :- भरतजी ने कहा – हे गङ्गे ! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवक के लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो। 

दो० — एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ ।
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ।। 197 ।।

अर्थात् :- इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरूजी की आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चलो। 

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा । भरत सोधु सबही कर लीन्हा ।।
सुर सेवा करि आयसु पाई । राम मातु पहिं गे दोउ भाई ।।

अर्थात् :- लोगों ने जहाँ-तहाँ डेरा डाल दिया। भरतजी ने सबका पता लगाया [ कि सब लोग आकर आराम से टिक गये हैं या नहीं ]। फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी के पास गये। 

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी । जननीं सकल भरत सनमानी ।।
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई । आपु निषादहि लीन्ह बोलाई ।।

अर्थात् :- चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजी ने सब माताओं का सत्कार किया। फिर भाई शत्रुघ्न को माताओं की सेवा सौंपकर आपने निषाद को बुला लिया। 

चले सखा कर सो कर जोरें । सिथिल सरीरु सनेह न थोरें ।।
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ । नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ।।

अर्थात् :- सखा निषादराज के हाथ-से-हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखा से पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ – और नेत्र और मन की जलन कुछ ठंडी करो। –

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए ।।
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ।।

अर्थात् :- जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रात को सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रों के कोयों में [ प्रेमाश्रुओं का ] जल भर आया। भरतजी के वचन सुनकर निषाद को बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया। –

दो० — जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ।। 198 ।।

अर्थात् :- जहाँ पवित्र अशोक के वृक्ष के नीचे श्रीरामजी ने विश्राम किया था। भरतजी ने वहाँ अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया।

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