Bharatji Chitrkut Ke Marg Mein / भरतजी चित्रकूट के मार्ग में

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bharatji Chitrkut Ke Marg Mein
भरतजी चित्रकूट के मार्ग में

भरतजी चित्रकूट के मार्ग में, Bharatji Chitrkut Ke Marg Mein :- सेवक, मित्र और मन्त्री के पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजी ने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं। भरतजी का भाईपना, भक्ति और आचरण कहने और सुनने से दुःख और दोषों के हरनेवाले हैं। हे सखी ! उनके सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है। श्रीरामचन्द्रजी के भाई ऐसे क्यों न हों ? भरतजी का स्वरुप देखते ही रास्ते में रहनेवाले लोगों के भाग्य खुल गये ! मानो दैवयोग से सिंहलद्वीप के बसने वालों को तीर्थराज प्रयाग सुलभ हो गया हो।    


जमुन तीर तेहि दिन करि बासू । भयउ समय सम सबहि सुपासू ।।

रातिहिं घाट घाट की तरनी । आईं अगनित जाहिं न बरनी ।।

अर्थात् :- उस दिन यमुना जी के किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये [ खान-पान आदि की ] सुन्दर व्यवस्था हुई। [ निषादराज सङ्केत पाकर ] रात-ही-रात में घाट-घाट की अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।  

प्रात पार भए एकहि खेवाँ । तोषे राम सखा की सेवाँ ।।
चले नहाइ नदिहि सिर नाई । साथ निषादनाथ दोउ भाई ।।

अर्थात् :- सबेरे एक ही खेवे में सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज की इस सेवा से सन्तुष्ट हुए। फिर स्नान करके और नदी को सिर नवाकर निषादराज के साथ दोनों भाई चले।

आगें मुनिबर बाहन आछें । राजसमाज जाइ सबु पाछें ।।
तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें । भूषन बसन बेष सुठि सादें ।।

अर्थात् :- आगे अच्छी-अच्छी सवारियों पर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राजसमाज जा रहा है। उसके पीछे दोनों भाई बहुत सादे भूषण-वस्त्र और वेष से पैदल चल रहे हैं।

सेवक सुहृद सचिवसुत साथा । सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ।।
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा । तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ।।

अर्थात् :- सेवक, मित्र और मन्त्री के पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजी ने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं।

दो० — मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ ।
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ।। 221 ।।

अर्थात् :- मार्ग में रहने वाले स्त्री-पुरुष यह सुनकर घर और काम-काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप ( सौन्दर्य ) और प्रेम को देखकर वे सब जन्म लेने का फल पाकर आनन्दित होते हैं। 

कहहिं सपेम एक एक पाहीं । रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ।।
बय बपु बरन रूपु सोइ आली । सीलु सनेहु सरिस सम चाली ।।

अर्थात् :- गाँवों की स्त्रियाँ एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक कहती हैं – सखी ! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं ? हे सखी ! इनकी अवस्था, शरीर और रंग-रूप तो वही है। शील, स्नेह उन्हीं के सदृश है और चाल भी उन्हीं के समान है।

बेषु न सो सखि सीय न संगा । आगें अनी चली चतुरंगा ।।
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा । सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ।।

अर्थात् :- परन्तु हे सखी ! इनका न तो वह वेष ( वल्क्यवस्त्रधारी मुनिवेष ) है, न सीताजी ही संग हैं। और इनके आगे चतुरङ्गिनी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मन में भेद है। हे सखी ! इसी भेद के कारण सन्देह होता है। 

तासु तरक तियगन मन मानी । कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ।।
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी । बोली मधुर बचन तिय दूजी ।।

अर्थात् :- उसका तर्क ( युक्ति ) अन्य स्त्रियों के मन भाया। सब कहती हैं कि इसके समान सयानी ( चतुर ) कोई नहीं है। उसकी सराहना करके और ‘ तेरी वाणी सत्य है ‘ इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली।

कहि सपेम सब कथाप्रसंगू । जेहि बिधि राम राज रस भंगू ।।
भरतहि बहुरि सराहन लागी । सील सनेह सुभाय सुभागी ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी के राजतिलक का आनन्द जिस तरह से भंग हुआ था वह सब कथा प्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री श्रीभरतजी के शील, स्नेह और स्वभाव की सराहना करने लगी।

दो० — चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु ।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ।। 222 ।।

अर्थात् :- [ वह बोली – ] देखो, ये भरतजी पिता के दिये हुए राज्य को त्यागकर पैदल चलते और फलाहार करते हुए श्रीरामजी को मनाने के लिये जा रहे हैं। इनके समान आज कौन है ?

भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू ।।
जो किछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई ।।

अर्थात् :- भरतजी का भाईपना, भक्ति और आचरण कहने और सुनने से दुःख और दोषों के हरनेवाले हैं। हे सखी ! उनके सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है। श्रीरामचन्द्रजी के भाई ऐसे क्यों न हों ?

हम सब सानुज भरतहि देखें । भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ।।
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं । कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ।।

अर्थात् :- छोटे भाई शत्रुघ्न सहित भरतजी को देखकर हम सब भी आज धन्य ( बड़भागिनी ) स्त्रियों की गिनती में आ गयीं। इस प्रकार भरतजी के गुण सुनकर और उनकी दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं और कहती हैं – यह पुत्र कैकेयी-जैसी माता के योग्य नहीं है।

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन । बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ।।
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी । लघु तिय कुल करतूति मलीनी ।।

अर्थात् :- कोई कहती हैं – इसमें रानी का भी दोष नहीं है। यह सब विधाता ने ही किया है, जो हमारे अनुकूल है। कहाँ तो हम लोक और वेद दोनों की विधि ( मर्यादा ) से हीन, कुल और करतूत दोनों से मलिन तुच्छ स्त्रियाँ। 

बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ।।
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ।।

अर्थात् :- जो बुरे देश ( जंगली प्रान्त ) और बुरे गाँव में बसती हैं और [ स्त्रियों में भी ] नीच स्त्रियाँ हैं ! और कहाँ यह महान् पुण्यों का परिणाम स्वरुप इनका दर्शन ! ऐसा ही आनन्द और आश्चर्य गाँव-गाँव में हो रहा है। मानो मरुभूमि में कल्पवृक्ष उग गया हो।

दो० — भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु ।
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ।। 223 ।।

अर्थात् :- भरतजी का स्वरुप देखते ही रास्ते में रहनेवाले लोगों के भाग्य खुल गये ! मानो दैवयोग से सिंहलद्वीप के बसने वालों को तीर्थराज प्रयाग सुलभ हो गया हो।

निज गुन सहित राम गुन गाथा । सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा ।।
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा । निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा ।।

अर्थात् :- [ इस प्रकार ] अपने गुणों सहित श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा सुनते और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं। वे तीर्थ देखकर स्नान और मुनियों के आश्रम तथा देवताओं के मन्दिर देखकर प्रणाम करते हैं। 

मनहीं मन मागहिं बरु एहू । सीय राम पद पदुम सनेहू ।।
मिलहिं किरात कोल बनबासी । बैखानस बटु जती उदासी ।।

अर्थात् :- और मन-ही-मन यह वरदान माँगते हैं कि श्रीसीतारामजी के चरणकमलों में प्रेम हो। मार्ग में शील, कोल आदि वनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं।

करि प्रनामु पूँछहिं जेहि तेही । केहि बन लखनु रामु बैदेही ।।
ते प्रभु समाचार सब कहहीं । भरतहि देखि जनम फलु लहहीं ।।

अर्थात् :- उनमें से जिस-तिस से प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और जानकीजी किस वन में हैं ? वे प्रभु के सब समाचार कहते हैं और भरतजी को देखकर जन्म का फल पाते हैं। 

जे जन कहहिं कुसल हम देखे । ते प्रिय राम लखन सम लेखे ।।
एहि बिधि बुझत सबहि समानी । सुनत राम बनबास कहानी ।।

अर्थात् :- जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम-लक्ष्मण के समान ही प्यारे मानते हैं। इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणी से पूछते और श्रीरामजी के वनवास की कहानी सुनते जाते हैं।

दो० — तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ।। 224 ।।

अर्थात् :- उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रातःकाल ही श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके चले। साथ के सब लोगों को भी भरतजी के समान ही श्रीरामजी के दर्शन की लालसा [ लगी हुई ] है।

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