भरतजी का मन्दाकिनी स्नान / Bharatji Ka Mandakini Snan

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bharatji Ka Mandakini Snan, Chitrkut Mein Pahunchna, Bharatadi Sabka Paraspar Milaap, Pita Ka Shok Aur Shraddh
भरतजी का मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध

Bharatji Ka Mandakini Snan, Chitrkut Mein Pahunchna, Bharatadi Sabka Paraspar Milaap, Pita Ka Shok Aur Shraddh, भरतजी का मन्दाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध :- उस समय भरत की दशा कैसी है ? जैसी जल की प्रवाह में जल की भौंरे की गति होती है। भरतजी का सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देह की सुध-बुध भूल गया )। भरतजी ने सेवक ( गुह ) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुँचे। वहाँ के वन और पर्वतों के समूह को देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न ( भोजन ) पा गया हो।  


जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ।।

कबि कुल अगम भरत गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ।।

अर्थात् :- यदि जगत् में भरत का जन्म नहीं होता, तो पृथ्वी पर सम्पूर्ण धर्मों की धुरी को कौन धारण करता ? हे रघुनाथजी ! कविकुल के लिये अगम ( उनकी कल्पना से अतीत ) भरतजी के गुणों की कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है ? 

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी । अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ।।
इहाँ भरतु सब सहित सहाए । मंदाकिनीं पुनीत नहाए ।।

अर्थात् :- लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी ने देवताओं की वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजी ने सारे समाज के साथ सम्पूर्ण मन्दाकिनी में स्नान किया। 

सरित समीप राखि सब लोगा । मागि मातु गुर सचिव नियोगा ।।
चले भरतु जहँ सिय रघुराई । साथ निषादनाथु लघु भाई ।।

अर्थात् :- फिर सबको नदी के समीप ठहरकर तथा माता, गुरु और मन्त्री की आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्न को साथ लेकर भरतजी वहाँ को चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे।

समुझि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ।।
रामु लखनु सिय मुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ।।

अर्थात् :- भरतजी अपनी माता कैकेयी की करनी को समझकर ( याद करके ) सकुचाते हैं और मन में करोड़ों ( अनेकों ) कुतर्क करते हैं [ सोचते हैं -] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरे जगह उठकर न चले जायँ। 

दो० — मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर ।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ।। 233 ।।

अर्थात् :- मुझे माता के मत में मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर ( अपने विरद और सम्बन्ध को देखकर ) मेरे पापों और अवगुणों को क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे।

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौं सनमानहिं सेवकु मानी ।।
मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ।।

अर्थात् :- चाहे मलिन-मन जानकार मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें ( कुछ भी करें ) ; मेरे तो श्रीरामचन्द्रजी की जूतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दास का ही है।

जग जस भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ।।
अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ।।

अर्थात् :- जगत् में यश के पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेम को सदा नया बनाये रखने में निपुण हैं। ऐसा मन में सोचते हुए भरतजी मार्ग में चले जाते हैं। उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेम से शिथिल हो रहे हैं।

फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी । चलत भगति बल धीरज धोरी ।।
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ।।

अर्थात् :- माता की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरज की धुरी को धारण करने वाले भरतजी भक्ति के बल से चले जाते हैं। तब श्रीरघुनाथजी के स्वभाव को समझते ( स्मरण करते ) हैं तब मार्ग में उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं। 

भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ।।
देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू ।।

अर्थात् :- उस समय भरत की दशा कैसी है ? जैसी जल की प्रवाह में जल की भौंरे की गति होती है। भरतजी का सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देह की सुध-बुध भूल गया )। 

दो० — लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु ।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ।। 234 ।।

अर्थात् :- मङ्गल-शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा – सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्त में दुःख होगा।

सेवक बचन सत्य सब जाने । आश्रम निकट जाइ निअराने ।।
भरत दीख बन सैल समाजू । मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ।।

अर्थात् :- भरतजी ने सेवक ( गुह ) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुँचे। वहाँ के वन और पर्वतों के समूह को देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न ( भोजन ) पा गया हो। 

ईति भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी ।।
जाइ सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ।।

अर्थात् :- जैसे ईति के भय से दुःखी हुई और तीनों ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ) तापों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियों से पीड़ित प्रजा किसी उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर दुखी हो जाय, भरतजी की गति ( दशा ) ठीक उसी प्रकार की हो रही है।

राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ।।
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी के निवास के वन की सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मन्त्री है।

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ।।
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ ।।

अर्थात् :- यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ) तथा नियम ( शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ) योद्धा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति और सुबुद्धि दो सुन्दर रानियाँ हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अङ्गों से पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के आश्रित रहने से उसके चित्त में चाव ( आनन्द या उत्साह ) है।
[ स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना – राज्य के सात अङ्ग हैं। ]

दो० — जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु ।
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु ।। 235 ।।

अर्थात् :- मोहरूपी राजा को सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके नगर में सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान है।

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे ।।
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना ।।

अर्थात् :- वनरूपी प्रान्तों में जो मुनियों के बहुत-से निवास स्थान हैं वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ों का समूह है। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओं का समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। 

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा ।।
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ।।

अर्थात् :- गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलों को देखकर राजा के साज को सराहते ही बनता है। ये सब आपस का वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरङ्गिनी सेना है।

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ।।
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन ।।

अर्थात् :- पानी के झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेकों प्रकार के नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा  कोयल के समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मन से कूज रहे हैं।

अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा ।।
बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला ।।

अर्थात् :- भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्य में चारों ओर मङ्गल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलों से युक्त हैं। सारा समाज आनन्द और मङ्गल का मूल बन रहा है।

दो० — राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु ।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ।। 236 ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी के पर्वत की शोभा देखकर भरतजी के हृदय में अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियम की समाप्ति होने पर तपस्या का फल पाकर सुखी होता है।

मासपारायण, बीसवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई ।।
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला ।।

अर्थात् :- तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजी से कहने लगा – हे नाथ ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं।

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ।।
नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला ।।

अर्थात् :- जिन श्रेष्ठ वृक्षों के बीच में एक सुन्दर विशाल बड़ का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर मन मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओं में सुख देनेवाली है। 

मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी ।।
ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई ।।

अर्थात् :- मानो ब्रह्माजी ने परम शोभा को एकत्र करके अन्धकार और ललिमामयी राशि-सी रच दी है। हे गुसाईं ! ये वृक्ष नदी के समीप हैं, जहाँ श्रीरामजी की पर्णकुटी छाया है।

तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए ।।
बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई ।।

अर्थात् :- वहाँ तुलसीजी के बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजी ने और कहीं लक्ष्मणजी ने लगाये हैं। इसी बड़ की छाया में सीताजी ने अपने करकमलों से सुन्दर वेदी बनायी है। 

दो० — जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ।। 237 ।।

अर्थात् :- जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनियों के वृन्द समेत बैठकर नित्य शास्त्र, वेद और पुराणों से सब कथा-इतिहास सुनते हैं। 

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी ।।
करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई ।।

अर्थात् :- सखा के वचन सुनकर और वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेम का वर्णन करने में सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं।

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका ।।
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी के चरणचिन्ह देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस हो गया हो। वहाँ की रज को मस्तक पर रखकर हृदय में और नेत्रों में लगाते हैं और श्रीरघुनाथजी के मिलने के समान सुख पाते हैं।

देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ।।
सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ।।

अर्थात् :- भरतजी की अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वन के पशु, पक्षी और जड़ ( वृक्षादि ) जीव प्रेम में मग्न हो गये। प्रेम के विशेष वश होने से सखा निषादराज को भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे। 

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे ।।
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को ।।

अर्थात् :- भरत के प्रेम की स्थिति को देखकर सिद्ध और साधक लोग भी अनुराग से भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेम की प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतल पर भरत का जन्म [ अथवा प्रेम ] न होता, तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता ?

दो० — पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर ।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ।। 238 ।।

अर्थात् :- प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिये स्वयं [ इस भरत रूपी गहरे समुद्र को अपने विरह रूपी मन्दराचल से ] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है। 

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा ।।
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन ।।

अर्थात् :- सखा निषादराज सहित इस मनोहर जोड़ी को सघन वन की आड़ के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के समस्त सुमङ्गलों के धाम और सुन्दर पवित्र आश्रम को देखा।

करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा ।।
देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे ।।

अर्थात् :- आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दुःख और दाह ( जलन ) मिट गया, मानो योगी को परमार्थ ( परमतत्त्व ) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं ( पूछी हुई बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं )। 

सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें ।।
बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू ।।

अर्थात् :- सिर पर जटा है। कमर में मुनियों का ( वल्कल ) वस्त्र बाँधे हैं और उसी में तरकस कसे हैं। हाथों में बाण तथा कंधे पर धनुष है। वेदी पर मुनि तथा साधुओं का समुदाय बैठा है और सीताजी सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं।

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा ।।
कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी के वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है। [ सीतारामजी ऐसे लगते हैं ] मानो रति और कामदेव ने मुनि का वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलों से धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जी की जलन हर लेते हैं ( अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसी को परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है )।  

दो० — लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु ।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ।। 239 ।।

अर्थात् :- सुन्दर मुनि मण्डली के बीच में सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं।

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