Bharatji Ka Prayag Jana / भरतजी का प्रयाग जाना

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bharatji Ka Prayag Jana Aur Bharat Bhardwaj Samvad
भरतजी का प्रयाग जाना और भरत भरद्वाज संवाद

Bharatji Ka Prayag Jana Aur Bharat Bhardwaj Samwad, भरतजी का प्रयाग जाना और भरत भरद्वाज संवाद :- त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। मुनियों का समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खाने से भी भरपूर हानि होती है। इस स्थान में यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी। वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलों का भोजन करते हैं, पृथ्वी पर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षों के नीचे निवास करके नित्य सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं। 


कियउ निषादनाथु अगुआईं । मातु पालकीं सकल चलाईं ।।

साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा । बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ।।

अर्थात् :- निषादराज को आगे करके पीछे सब माताओं की पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्रह्माणों सहित गुरुजी ने नमन किया।

आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू । सुमिरे लखन सहित सिय रामू ।।
गवने भरत पयादेहिं पाए । कोतल संग जाहिं डोरिआए ।।

अर्थात् :- तदनन्तर आप ( भरतजी ) ने गङ्गाजी को प्रणाम किया और लक्ष्मण सहित श्रीसीतारामजी का स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल ( बिना सवार के ) घोड़े बागडोर से बँधे हुए चले जा रहे हैं। 

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा । होइअ नाथ अस्व असवारा ।।
रामु पयादेहि पायँ सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ।।

अर्थात् :- उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ ! आप घोड़े पर सवार हो लीजिये। [ भरतजी जवाब देते हैं कि ] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं। 

सिर भर जाऊँ उचित अस मोरा । सब तें सेवक धरमु कठोरा ।।
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी । सब सेवक गन गरहिं गलानी ।।

अर्थात् :- मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिर के बल चलकर जाऊँ। सेवक का धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजी की दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानि के मारे गले जा रहे हैं। 

दो० — भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग ।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ।। 203 ।।

अर्थात् :- प्रेम से उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया। 

झलका झलकत पायन्ह कैसें । पंकज कोस ओस कन जैसें ।।
भरत पयादेहिं आए आजू । भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ।।

अर्थात् :- उनके चरणों में छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया। 

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए । कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ।।
सबिधि सितासित नीर नहाने । दिए दान महिसुर सनमाने ।।

अर्थात् :- जब भरतजी ने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणी पर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक [ गङ्गा-यमुना के ] श्वेत और श्याम जल में स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान किया। 

देखत स्यामल धवल हलोरे । पुलकि सरीर भरत कर जोरे ।।
सकल काम प्रद तीरथराऊ । बेद बिदित जग प्रकट प्रभाऊ ।।

अर्थात् :- श्याम और सफेद ( यमुनाजी और गङ्गाजी की ) लहरों को देखकर भरतजी का शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा – हे तीर्थराज ! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध और संसार में प्रकट है। 

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू ।।
अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिं जग जाचक बानी ।।

अर्थात् :- मैं अपना धर्म ( न माँगने का क्षत्रिय धर्म ) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता ? ऐसा हृदय में जानकर सुजान उत्तम दानी जगत् में माँगने वाले की वाणी को सफल किया करते हैं ( अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं )। 

दो० — अरथ न धरम न काम रूचि गति न चहउँ निरबान ।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ।। 204 ।।

अर्थात् :- मुझे न अर्थ की रुचि ( इच्छा ) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्रीरामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं। 

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ।।
सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ।।

अर्थात् :- स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें ; पर श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन-दिन बढ़ता ही रहे। 

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ।।
चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई ।।

अर्थात् :- मेघ चाहे जन्म भर चातक की सुधि भुला दे और जल माँगने पर वह चाहे बज्र और पत्थर ( ओले ) ही गिरावे, पर चातक की रटन घटने से तो उसकी बात ही घट जायगी ( प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी )। उसकी तो प्रेम बढ़ने में ही सब तरह से भलाई है। 

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें । तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ।।
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी । भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ।।

अर्थात् :- जैसे तपने से सोने पर आब ( चमक ) आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में प्रेम का नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है। भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी में से सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई। 

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू । राम चरन अनुराग अगाधू ।।
बादि गलानि करहु मन माहीं । तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ।।

अर्थात् :- हे तात भरत ! तुम सब प्रकार के साधु हो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्रजी को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है। 

दो० — तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल ।
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ।। 205 ।।

अर्थात् :- त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। 

प्रमुदित तीरथराज निवासी । बैखानस बटु गृही उदासी ।।
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा । भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा ।।

अर्थात् :- तीर्थराज में रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन ( संन्यासी ) सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस-पाँच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरतजी का प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है। 

सुनत राम गुन ग्राम सुहाए । भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ।।
दंड प्रनामु करत मुनि देखे । मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर गुणसमूहों को सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी के पास आये। मुनि ने भरतजी को दण्डवत्-प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान् सौभाग्य समझा।  

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ।।
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे । चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ।।

अर्थात् :- उन्होंने दौड़कर भरतजी को उठाकर हृदय में लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनि ने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोच के घर में घुस जाना चाहते हैं।

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू ।।
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई ।।

अर्थात् :- उनके मन में यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [ तो मैं क्या उत्तर दूँगा ]। भरतजी के शील और संकोच को देखकर ऋषि बोले – भरत ! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाता के कर्तव्य पर कुछ वश नहीं चलता।

दो० — तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति ।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ।। 206 ।।

अर्थात् :- माता की करतूत को समझकर ( याद करके ) तुम हृदय में ग्लानि मत करो। हे तात ! कैकेयी का कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी। 

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोकु बेदु बुध संमत दोऊ ।।
तात तुम्हार बिमल जसु गाई । पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ।।

अर्थात् :- यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है। किन्तु हे तात ! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों में बड़ाई पावेंगे।

लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई ।।
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ।।

अर्थात् :- यह वेद और लोक दोनों का मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है। राजा सत्यव्रती थे ; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती। 

राम गवनु वन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ।।
सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ।।

अर्थात् :- सारे अनर्थ की जड़ तो श्रीरामचन्द्रजी का वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसार को पीड़ा हुई। वह श्रीरामजी का वनगमन भी भावीवश हुआ। बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्त में पछतायी।

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहै सो अधम अयान असाधू ।।
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ।।

अर्थात् :- उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता। सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को भी सन्तोष ही होता।

दो० — अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु ।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ।। 207 ।।

अर्थात् :- हे भरत ! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया ; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम होना ही संसार में समस्त सुन्दर मङ्गलों का मूल है। 

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना । भूरिभाग को तुम्हहि समाना ।।
यह तुम्हार आचरजु न ताता । दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ।।

अर्थात् :- सो वह ( श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम ) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है ; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है ? हे तात ! तुम्हारे लिये यह आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजी के पुत्र और श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे भाई हो। 

सुनहु भरत रघुबर मन माहीं । पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ।।
लखन राम सीतहि अति प्रीती । निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ।।

अर्थात् :- हे भरत ! सुनो, श्रीरामचन्द्रजी के मन में तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजी तीनों को सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेम के साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती। 

जाना मरमु नहात प्रयागा । मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ।।
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें । सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ।।

अर्थात् :- प्रयागराज में जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेम में मग्न हो रहे थे। तुम पर श्रीरामचन्द्रजी का ऐसा ही ( अगाध ) स्नेह है जैसा मूर्ख ( विषयासक्त ) मनुष्य का संसार में सुखमय जीवन पर होता है। 

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई । प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ।।
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू । धरें देह जनु राम सनेहू ।।

अर्थात् :- यह श्रीरघुनाथजी की बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागत के कुटुम्ब भर को पालने वाले हैं। हे भरत ! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजी के प्रेम ही हो।

दो० — तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु ।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ।। 208 ।।

अर्थात् :- हे भरत ! तुम्हारे लिये ( तुम्हारी समझ में ) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्ति रूपी रस की सिद्धि के लिये यह समय गणेश ( बड़ा शुभ ) हुआ है।

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