Bhardwaj Dwara Bharatji Ka Satkaar / भरद्वाज द्वारा भरतजी

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Bhardwaj Dwara Bharatji Ka Satkaar
भरद्वाज द्वारा भरतजी का सत्कार

Bhardwaj Dwara Bharatji Ka Satkaar, भरद्वाज द्वारा भरतजी का सत्कार :- माता का कुमत ( बुरा विचार ) पापों का मूल बढ़ई है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षों की अवधि रूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्र को गाड़ दिया। [ यहाँ माता का कुविचार बढ़ई है, भरत को राज्य बसूला है, राम का वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्ष की अवधि कुमन्त्र है ]। इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज जी ने उनका समाधान करके कहा – अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये।    


एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती । भूख न बासर नीद न राती ।।

एहि कुरोग कर औषधु नाहीं । सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ।।

अर्थात् :- इसी दुःख की जलन से निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिन में भूख लगती है, न रात को नींद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्व को खोज डाला, पर इस कुरोग की औषध कहीं नहीं है।

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला । तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ।।
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू ।।

अर्थात् :- माता का कुमत ( बुरा विचार ) पापों का मूल बढ़ई है। उसने हमारे हित का बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठ का कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षों की अवधि रूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्र को गाड़ दिया। [ यहाँ माता का कुविचार बढ़ई है, भरत को राज्य बसूला है, राम का वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्ष की अवधि कुमन्त्र है ]। 

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा । घालेसि सब जगु बारहबाटा ।।
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ । बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ।।

अर्थात् :- मेरे लिये उसने सारा कुठाट ( बुरा साज ) रचा और सारे जगत् को बारहबाट (छिन्न-भिन्न ) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजी के लौटे आने पर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपाय से नहीं। 

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई । सबहिं किन्हि बहु भाँति बड़ाई ।।
तात करहु जनि सोचु बिसेषी । सब दुखु मिटिहि राम पग देखी ।।

अर्थात् :- भरतजी के वचन सुनकर मुनि ने सुख पाया और सभी ने उनकी बहुत प्रकार से बड़ाई की। [ मुनि ने कहा – ] हे तात ! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा। 

दो० — करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु ।
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ।। 212 ।।

अर्थात् :- इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज जी ने उनका समाधान करके कहा – अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये।

सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ।।
जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी । चरन बंदि बोले कर जोरी ।।

अर्थात् :- मुनि के वचन सुनकर भरत के हृदय में सोच हुआ कि यह बेमौ के बड़ा बेढ़ब संकोच आ पड़ा ! फिर गुरुजनों की वाणी को महत्त्वपूर्ण ( आदरणीय ) समझकर, चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले। –

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ।।
भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! आपकी आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है। भरतजी के ये वचन मुनिश्रेष्ठजी के मन को अच्छे लगे। उन्होंने विश्वास पात्र सेवकों और शिष्यों को पास बुलाया।

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई । कंद मूल फल आनहु जाई ।।
भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए । प्रमुदित निज निज काज सिधाए ।।

अर्थात् :- [ और कहा कि ] भरत की पहुनई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने ‘ हे नाथ ! बहुत अच्छा ‘ कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने काम को चल दिये।

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिअ जस देवता ।।
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं । आयसु होइ सो करहिं गोसाईं ।।

अर्थात् :- मुनि को चिन्ता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमान को न्योता है। अब जैसा देवता हो, वैसी ही उसकी पूजा भी होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमादि सिद्धियाँ आ गयीं [ और बोलीं – ] हे गोसाईं ! जो आपकी आज्ञा हो सो हम करें। 

दो० — राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ।। 213 ।।

अर्थात् :- मुनिराज ने प्रसन्न होकर कहा – छोटे भाई शत्रुघ्न और समाजसहित भरतजी श्रीरामचन्द्रजी के विरह में व्याकुल हैं, इनकी पहुनाई ( आतिथ्य-सत्कार ) करके इनके श्रम को दूर करो। 

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी । बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ।।
कहहिं परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि राम लघु भाई ।।

अर्थात् :- ऋद्धि-सिद्धि ने मुनिराज की आज्ञा को सिर चढ़ाकर अपने को बड़भागिनी समझा। सब सिद्धियाँ आपस में कहने लगीं – श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलना में कोई नहीं आ सकता। 

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू । होइ सुखी सब राज समाजू ।।
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना । जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ।।

अर्थात् :- अतः मुनि के चरणों की वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी बिलखते हैं ( लजा जाते हैं )।

भोग बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ।।
दासीं दास साजु सब लीन्हें । जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ।।

अर्थात् :- उन घरों में बहुत-से भोग ( इन्द्रियों के विषय ) और ऐश्वर्य ( ठाट-बाट ) का समान भरकर रख दिया, जिनके देखकर देवता भी ललचा गये। दासी-दास सब प्रकार की सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनों को देखते रहते हैं ( अर्थात् उनके मन की रूचि के अनुसार करते रहते हैं )। 

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं । जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ।।
प्रथमहिं बास दिए सब केही । सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ।।

अर्थात् :- जो सुख के सामान स्वर्ग में भी स्वप्न में भी नहीं हैं ऐसे सब सामान सिद्धियों ने पलभर में सज दिये। पहले तो उन्होंने सब किसी को, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवास स्थान दिये। 

दो० — बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह ।
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ।। 214 ।।

अर्थात् :- और फिर कुटुम्ब सहित भरतजी को दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजी ने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [ भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियों को आराम मिले, इसलिये उनके मन की बात जानकर मुनि ने पहले उन लोगों को स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजी को स्थान देने की आज्ञा दी थी। ] मुनिश्रेष्ठ ने तपोबल से ब्रह्मा को भी चकित कर देने वाला वैभव रच दिया। 

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ।।
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी । देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी ।।

अर्थात् :- जब भरतजी ने मुनि के प्रभाव को देखा तो उसके सामने उन्हें [ इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर आदि ] सभी लोकपालों के लोक तुच्छ जान पड़े। सुख की सामाग्री का वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं।

आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ।।
सुरभि फूल फल अमिअ समाना । बिमल जलासय बिबिध बिधाना ।।

अर्थात् :- आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चँदावे, वन, बगीचे, भाँति-भाँति के पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृत के समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकार के ( तालाब, कुएँ, बावली आदि ) निर्मल जलाशय।  

असन पान सुचि अमिअ अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ।।
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें । लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ।।

अर्थात् :- तथा अमृत के भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पान के पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों ( विरक्त मुनियों ) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभी के डेरों में [ मनोवाञ्छित वस्तु देने वाले ] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणी को भी अभिलाषा होती है ( उनका भी मन ललचा जाता है )।  

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी । सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा । देखि हरष बिसमय बस लोगा ।।

अर्थात् :- वसन्त ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को [ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विषाद के वश हो रहे हैं। [ हर्ष तो भोग-सामग्रियों को और मुनि के तपःप्रभाव को देखकर होता है और विषाद इस बात से होता है कि श्रीराम के वियोग में नियम-व्रत से रहने वाले हमलोग भोग-विलास में क्यों आ फँसे ; कहीं इनमे आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतों को न त्याग दे ]। 

दो० — संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ।। 215 ।।

अर्थात् :- सम्पत्ति ( भोग-विलास की सामग्री ) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनि की आज्ञा खेल है, जिसने उस रात को आश्रम रूपी पिंजड़े में दोनों को बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया। [ जैसे किसी बहेलिये के द्वारा एक पिंजड़े में रखे जाने पर भी चकवी-चकवे का रात को संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजी की आज्ञा से रातभर भोग-सामग्रियों के साथ रहने पर भी भरतजी ने मन से भी उनका स्पर्श तक नहीं किया ]।

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