Bhavanyashtakam / भवान्यष्टकम्

Bhavanyashtakam
भवान्यष्टकम्

Bhavanyashtakam, भवान्यष्टकम् :- हे भवानि ! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यान मार्ग का ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रों का भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदि की क्रियाओं से तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। न मैं पुण्य जानता हूँ और न तीर्थ, न मुक्ति का पता है न लय का। हे मातः ! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि ! अब केवल तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। हे भवानि ! मैं सदा से ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूँगा, विपद्ग्रस्त और नष्टप्राय हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो।

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता 
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।

न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।। 1 ।।  

अर्थात् :- हे भवानि ! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति- इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि ! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। 

भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः 
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।

कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।। 2 ।।  

अर्थात् :- मैं अपार भवसागर में पड़ा हुआ हूँ, महान् दुःखों से भयभीत हूँ; कामी, लोभी, मतवाला तथा संसार के घृणित बन्धनों में बँधा हुआ हूँ, हे भवानि ! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। 

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न जानामि दानं च ध्यानयोगं 
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।  

न जानामि पूजां न च न्यासयोगं 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।। 3 ।। 

अर्थात् :- हे भवानि ! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यान मार्ग का ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रों का भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदि की क्रियाओं से तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। 

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं 
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।

न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।। 4 ।।

अर्थात् :- न मैं पुण्य जानता हूँ और न तीर्थ, न मुक्ति का पता है न लय का। हे मातः ! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि ! अब केवल तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो। 

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कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः 
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।

कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्ध सदाहं 
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।। 5 ।। 

अर्थात् :- मैं कुकर्मी, बुरी संगति में रहने वाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचार से हीन, दुराचार परायण, कुत्सित दृष्टि रखने वाला और सदा दुर्वचन बोलने वाला हूँ, हे भवानि ! मुझ अधम की अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो।

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