Bhawani Stuti / भवानी स्तुति

Bhawani Stuti
भवानी स्तुति

Bhawani Stuti, भवानी स्तुति :- हे देवि ! तुम रूप, सुख और शील की सीमा होल दुष्टों के लिये तुम  भयानक रूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं लक्ष्मी, तुम्हीं पार्वती और तुम्हीं श्रेष्ठ बुद्धिवाली सरस्वती हो। हे जगज्जननि ! तुम स्वामि कार्तिकेय और गणेशजी की माता हो और शिवजी की गृहिणी हो; हे भवानी ! तुम्हारी जय हो, जय हो। वेद, शास्त्र और सहस्त्र जीभ वाले शेषजी तुम्हारा गुणगान करते हैं; परंतु उसका पार पाना उनके लिये बड़ा कठिन है। हे माता ! मुझ तुलसीदास को श्रीरामजी में वैसा ही प्रण, प्रेम और नेम दो, जैसा चातक का श्याम मेघ में होता है।

दुसह दोष-दुख, दलनि,
करु देवि दाया ।
विश्व-मूला सि, जन-सानुकूला सि,
कर शूलधारिणि महामूलमाया ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे देवि ! तुम दुःसह दोष और दुःखों का दमन करने वाली हो, मुझ पर दया करो। तुम विश्व-ब्रह्माण्ड की मूल (उत्पत्ति-स्थान) हो, भक्तों पर सदा अनुकूल रहती हो, दुष्टदलन के लिये हाथ में त्रिशूल धारण किये हो और सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली मूल (अव्याकृत) प्रकृति हो।

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तडित गर्भाङ्ग सर्वाङ्ग सुन्दर लसत,
दिव्य पट भव्य भूषण विराजैं ।
बालमृग-मंजु खञ्जन-विलोचनि,
चन्द्रवदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं ।। 2 ।।

अर्थात् :- तुम्हारे सुन्दर शरीर के समस्त अंगों में बिजली-सी चमक रही है, उन पर दिव्य वस्त्र और सुन्दर आभूषण शोभित हो रहे हैं। तुम्हारे नेत्र मृगछौने और खंजन के नेत्रों के समान सुन्दर हैं, मुख चन्द्रमा के समान है, तुम्हें देखकर करोड़ों रति और कामदेव लज्जित होते हैं।

रूप-सुख-शील-सीमा सि, ,भीमा सि,
रामा सि , वामा सि वर बुद्धि बानी ।
छमुख-हेरंब-अंबासि, जगदंबिके,
शंभु-जायासि जय जय भवानी ।। 3 ।।

अर्थात् :- तुम रूप, सुख और शील की सीमा होल दुष्टों के लिये तुम  भयानक रूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं लक्ष्मी, तुम्हीं पार्वती और तुम्हीं श्रेष्ठ बुद्धिवाली सरस्वती हो। हे जगज्जननि ! तुम स्वामि कार्तिकेय और गणेशजी की माता हो और शिवजी की गृहिणी हो; हे भवानी ! तुम्हारी जय हो, जय हो।

चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष
मुंड-मद-भंग कर अंग तोरे ।
शुंभ-निःशुंभ कुम्भीश रण-केशरिणि,
क्रोध-वारीश अरि-वृन्द बोरे ।। 4 ।।

अर्थात् :- तुम चण्ड दानव के भुजदण्डों का खण्डन करने वाली और महिषासुर को मारने वाली हो, मुण्ड दानव के घमण्ड का नाश कर तुम्हीं ने उसके अंग-प्रत्यंग तोड़े हैं। शुम्भ-निशुम्भ रूपी मतवाले हाथियों के लिये तुम रण में सिंहिनी हो। तुमने अपने क्रोध रूपी समुद्र में शत्रुओं के दल-के-दल डुबो दिये हैं।

निगम-आगम-अगम गुर्वि ! तव गुन-
कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीहा ।
देहि मा, मोहि पन प्रेम यह नेम निज,
राम घनश्याम तुलसी पपीहा ।। 5 ।।

अर्थात् :- वेद, शास्त्र और सहस्त्र जीभ वाले शेषजी तुम्हारा गुणगान करते हैं; परंतु उसका पार पाना उनके लिये बड़ा कठिन है। हे माता ! मुझ तुलसीदास को श्रीरामजी में वैसा ही प्रण, प्रेम और नेम दो, जैसा चातक का श्याम मेघ में होता है।

नवदुर्गा
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।

अर्थात् :- प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरी स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है।

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