Bhishma Ashtami Vrat Katha / भीष्म अष्टमी व्रत कथा और पूजा

Bhishma Ashtami Vrat Katha Aur Puja Vidhi
भीष्म अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि


Bhishma Ashtami Vrat Katha Aur Puja Vidhi, भीष्म अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत माघ शुक्लपक्ष अष्टमी को होता है। इस दिन बाल-ब्रह्मचारी, कौरव-पाण्डवों के पूर्वज भीष्म पितामह की इच्छा-मृत्यु हुई थी।

भीष्माष्टमी पूजा विधि :-

इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि करने के उपरान्त भीष्म के नाम से पूजन तथा तर्पण करने से वीर तथा सत्यवादी सन्तान की उत्पत्ति होती है।

भीष्माष्टमी व्रत कथा :-

एक समय की बात है राजा शांतनु शिकार खेलते हुए निषादराज की कन्या मत्स्यगंधा के द्वारा गंगा पार हुए। निषाद की कन्या मत्स्यगन्धा के द्वारा गंगा पार हुए। निषाद की कन्या मत्स्यगंधा अत्यन्त रूपवती थी जिसको देखते ही राजा काम-मोहित होकर वासना-तरंग में आकाश-पाताल में पहुँचने लगे।

राजा ने निषाद से वैवाहिक प्रस्ताव रखा, किन्तु उसने इनकार कर दिया। राजा ने अनुनय-विनय करने पर उसने कहा कि मैं अपनी कन्या का विवाह तभी कर सकता हूँ, जब उसका पुत्र राजगद्दी का उत्तराधिकारी हो। मगर यह समस्या आपके पुत्र भीष्म के रहते पहले से ही समाप्त हो गई है। इसलिए मैं विवाह करने में अपने को असमर्थ पाता हूँ। निषाद द्वारा यह बात सुनकर शान्तनु राजधानी चले आये। किन्तु उनका मन सदा व्यग्र और उदास रहने लगा।

यह बात पुत्र भीष्म को खटकी और उन्होंने इसका निमित्त जानना चाहा। राजा ने बेटे से सही-सही बात बता दी। भीष्म जी पिता की दुखदीनता को दूर करने के लिए निषाद को समझाते हुए गंगा में हिलकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की। इस तरह निषाद इनकी बातों सन्तुष्ट हो गया और अपनी कन्या मत्स्यगंधा का विवाह शान्तनु से कर दिया। राजा ने पुत्र भीष्म की पितृभक्ति देखकर आशीर्वाद दिया कि ‘ तुम मृत्युंजय होगे।’

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