Bhishma Panchak Vrat Katha / भीष्म पंचक व्रत कथा और पूजा

Bhishma Panchak Vrat Katha Aur Puja Vidhi
भीष्म पंचक व्रत कथा और पूजा विधि


Bhishma Panchak Vrat Katha Aur Puja Vidhi, भीष्म पंचक व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा को समाप्त होता है। इसको ‘ पंचभीका ‘ भी कहते हैं।

भीष्म पंचक पूजा विधि :-

कार्तिक स्नान करने वाले स्त्री-पुरुष पाँच दिन का निराहार ( निर्जला ) व्रत करते हैं।

अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए यह व्रत किया जाता है। इसमें निम्न लिखित गीत गाये जाते हैं —

कौन जाति पनिहारिन रे नेक ठाढ़ी रहियो ।
का तेरी नाउँ कौन की बेटी रामा ।।

कौन के घर ब्याही रे नेक ठाढ़ी रहियो ।
मथुरा जी से चली रे गुजरिया रामा ।
धारी ईडुरी सिर गगरी रे नेक ठाढ़ी रहियो ।।

भीष्म पंचक व्रत कथा :-

इस व्रत की शुरूआत महाभारत काल में हुई थी और पितामह भीष्म के नाम पर इस व्रत का नाम भीष्म पंचक व्रत पड़ा। दरअसल महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पितामह भीष्म जब शरशैय्या पर पड़े हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में मृत्यु के दिन गीन रहे थें, जब भगवान् श्री कृष्ण ने पाण्डवों को उनसे शिक्षा ग्रहण करने भेजा था। तब पाँच दिनों तक भीष्म ने धर्म, कर्म, नीति, राज्यनीति और मोक्ष के सम्बन्ध में जो ज्ञान पांडवों को दिया, उसी के नाम पर श्रीकृष्ण ने इस व्रत का नाम भीष्म पंचक रखा। इस व्रत को करने से समस्त प्रकार के पुण्य, अर्थ, मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

इसे भी पढ़ें :-

Leave a Comment

error: Content is protected !!